साल 2026 की शुरुआत दुनिया के अनेक हिस्सों में अनिश्चितताओं और आशंकाओं के साये के साथ हो रही है, लेकिन इसी समय भारत और वैश्विक दक्षिण के कई देशों में आशावाद की एक सशक्त लहर दिखाई देती है।

कमलाकर सिंह
साल 2026 की शुरुआत दुनिया के अनेक हिस्सों में अनिश्चितताओं और आशंकाओं के साये के साथ हो रही है, लेकिन इसी समय भारत और वैश्विक दक्षिण के कई देशों में आशावाद की एक सशक्त लहर दिखाई देती है। यह आशावाद केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक उपलब्धियों, सामाजिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय आकांक्षाओं पर आधारित है। यही कारण है कि जहाँ वैश्विक नेट होप स्कोर अभी मात्र +11% है — यानी दुनिया में औसतन उम्मीद का स्तर थोड़ा-सा सकारात्मक है — वहीं भारत दुनिया के सबसे आशावादी तीन देशों में शामिल होकर नेट होप स्कोर 27% पर है, जो दर्शाता है कि भारत की बड़ी आबादी भविष्य को लेकर काफी आशावान है। यह तथ्य अपने-आप में इस मानसिक और सामाजिक परिवर्तन का संकेतक है। उल्लेखनीय है कि नेट होप स्कोर दरअसल एक सर्वे पर आधारित होता है, जहाँ लोगों से पूछा जाता है कि वे आने वाले समय को लेकर कितने आशावादी या निराशावादी हैं। कुल आशावादी प्रतिशत में से निराशावादी प्रतिशत घटाकर यह स्कोर निर्धारित किया जाता है, जिससे स्पष्ट होता है कि समग्र रूप से जनता का मनोभाव सकारात्मक है या नकारात्मक।
भारत में यह आशावाद अचानक उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में निर्मित उस सामूहिक आत्मविश्वास का परिणाम है जिसमें देश को एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जाने लगा है। 1 जनवरी 2026 को भारत का जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना केवल आँकड़ों का परिवर्तन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मनोविज्ञान के पुनर्निर्माण का भी प्रतीक है। आज भारत की अर्थव्यवस्था 4.18 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर आ पहुँची है और इसके साथ ही भारतीय परिवारों में उपभोग और जीवन स्तर को लेकर सकारात्मक उम्मीदें भी मजबूत हुई हैं। यह स्थिति तब और महत्त्वपूर्ण हो जाती है जब हम देखते हैं कि दुनिया भर में सबसे अधिक 60% भारतीय परिवार अगले छह महीनों में अपने खर्च को बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। ऑटोमोबाइल और मोबाइल उपकरण जैसे बड़े उपभोग–क्षेत्रों में 70% तक की खरीदारी–इच्छा इस बात का संकेत है कि भारत का मध्यम वर्ग केवल बचत और सुरक्षा–मनोवृत्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आत्मविश्वासपूर्ण उपभोग–संस्कृति की ओर अग्रसर है।
इस आशावाद का एक और प्रमुख आधार राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में प्राप्त आत्मविश्वास है। मई 2025 में संचालित “ऑपरेशन सिंदूर” ने न केवल सामरिक दृष्टि से सफलता अर्जित की, बल्कि नागरिकों के मानस में यह भरोसा भी मजबूत किया कि राष्ट्र अपने हितों और नागरिक–सुरक्षा की प्रभावी रक्षा करने में सक्षम है। इस अभियान के बाद भारत के राष्ट्रीय आशावाद सूचकांक में तीन प्रतिशत अंकों की वृद्धि दर्ज होना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि आर्थिक प्रगति और सुरक्षा–विश्वास जब साथ जुड़ते हैं तो वे जनमानस को नई ऊर्जा और स्थिरता प्रदान करते हैं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति और भू–राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियाँ मौजूद होने के बावजूद आधे से अधिक भारतीयों को यह भरोसा है कि 2026 में उनके जीवन–स्तर में और सुधार होगा।
इसके विपरीत, यूरोप और विकसित विश्व के कई देशों में गहरी आशंका और बेचैनी का भाव दिखाई देता है। बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में नेट समृद्धि स्कोर गंभीर रूप से नकारात्मक है। आर्थिक ठहराव, सामाजिक असंतोष और राजनीतिक अनिश्चितता वहाँ के नागरिकों के मन में भविष्य को लेकर संशय उत्पन्न कर रही है। कुछ विश्लेषक इस क्षेत्र को “एंग्ज़ायटी बेल्ट” की संज्ञा देते हैं। वहीं जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी सुधार की हल्की झलक अवश्य मिलती है, पर वहाँ आर्थिक उछाल की अपेक्षा स्थिरता बनाए रखने की प्रवृत्ति अधिक प्रबल है। इसके समानांतर इंडोनेशिया, केन्या, सीरिया और सऊदी अरब जैसे देशों में आशावाद का स्तर अत्यंत ऊँचा है, जो यह दर्शाता है कि आज का वैश्विक आशावाद धीरे–धीरे विकसित अर्थव्यवस्थाओं से हटकर वैश्विक दक्षिण की ओर केंद्रित होता जा रहा है।
इस सामूहिक आशावाद का प्रभाव लोगों की जीवन–शैली और प्राथमिकताओं पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वर्ष 2026 को “स्वैच्छिक स्वस्थ जीवन” के रूप में देखा जा रहा है। भारत में 65% लोगों ने अपने शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का संकल्प लिया है। स्वास्थ्य अब केवल बीमारी के बाद लिया जाने वाला चिकित्सकीय कदम नहीं, बल्कि जीवन–अनुशासन का हिस्सा बनता जा रहा है — योग, हल्के व्यायाम, संतुलित आहार और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजगता इसका प्रमाण हैं। इसी प्रकार “डिजिटल डिटॉक्स” की अवधारणा भी अब सीमांत या अल्प–संख्यक प्रवृत्ति नहीं रही। 43% भारतीयों ने 2026 में अपने मोबाइल उपयोग को कम करने का निश्चय इस उद्देश्य से किया है कि मानसिक शांति, आत्म–संवाद और मानवीय रिश्तों की गुणवत्ता को पुनः सशक्त बनाया जा सके।
इसके साथ–साथ एआई, कोडिंग और डिजिटल मार्केटिंग जैसे भविष्य–कौशलों की दिशा में युवाओं का बढ़ता झुकाव यह बताता है कि यह आशावाद केवल वर्तमान की संतुष्टि का भाव नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी की सजग मानसिकता भी अपने भीतर समेटे हुए है। यह एक ऐसा आशावाद है जो आत्मविश्वास, श्रम, कौशल और अवसरों के संयोजन पर आधारित है।
आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में संशय, थकान और अविश्वास का वातावरण गहराता जा रहा है, भारत और वैश्विक दक्षिण के देशों में यह “आशावाद का प्रादुर्भाव” (Outbreak of Optimism) एक नई दिशा प्रस्तुत करता है। यह भावना ‘सब ठीक होगा’ जैसी सरल अवधारणा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस विश्वास पर टिकी है कि चुनौतियों के बीच भी भविष्य को श्रम, नीति–दृष्टि और सामूहिक संकल्प के माध्यम से बेहतर बनाया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि इस सकारात्मक ऊर्जा को संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय और समावेशन के साथ जोड़ा जाए, ताकि आशावाद केवल कुछ वर्गों की मनोदशा न रहकर पूरे समाज की प्रगति का आधार बन सके। यदि यह संतुलन बनाए रखा गया, तो 2026 वास्तव में उस ऐतिहासिक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा जब दुनिया की मानसिक धुरी एक नए, आशावादी और आत्मविश्वासी वैश्विक दक्षिण की ओर निर्णायक रूप से मुड़ेंगी।
लेखक पूर्व कुलपति हैं

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