26 जनवरी 2026 को भारत अपने गणतंत्र की 77वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर न केवल उत्सव का है, बल्कि अपने गणतंत्र और संविधान के महत्व पर गंभीर चिंतन का भी है ।
By: Star News
Jan 25, 20267:50 PM
निखिलेश महेश्वरी
26 जनवरी 2026 को भारत अपने गणतंत्र की 77वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर न केवल उत्सव का है, बल्कि अपने गणतंत्र और संविधान के महत्व पर गंभीर चिंतन का भी है । 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान को अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी 1950 को वह विधिवत रूप से लागू हुआ । इसी के साथ भारत ने एक संप्रभु, लोकतांत्रिक, समतावादी और स्वतंत्र गणराज्य के रूप में अपनी ऐतिहासिक यात्रा का शुभारंभ किया। अतः यह दिन प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए राष्ट्रीय गौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक है । भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की आत्मा, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों के कर्तव्यों का एक जीवंत मार्गदर्शक है ।
भारतीय संविधान राष्ट्र के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की स्थापना का सशक्त आधार प्रदान करता है । संविधान की उद्देशिका में यह स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्रदान कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए, दृढ़संकल्प के साथ कार्य करने का एक अभिवचन करते हैं ।” संविधान, नागरिकों को जहाँ मूलभूत अधिकार देता है, वहीं 'कर्तव्य' और 'राष्ट्रबोध' के माध्यम से राष्ट्र के प्रति उनकी जवाबदेही को भी सुनिश्चित करता है ।
इन 77 वर्षों में भारत ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है । भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सुव्यवस्थित लोकतांत्रिक ढाँचे के कारण भारत ने अनेक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं और आज वह विश्व समुदाय के साथ आत्मविश्वासपूर्वक आंखो में आंखे डालकर संवाद करता है। स्वतंत्रता प्राप्ति और संविधान के प्रवर्तन के पश्चात भारत ने निरंतर प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। वर्तमान में भारत विश्व की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी रूप से उभर रहा है। साथ ही सामान्य नागरिक भी आर्थिक, शैक्षिक एवं सामाजिक समानता के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति करता हुआ दिखाई देता है ।
यह समग्र विकास भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकारों की सुदृढ़ व्यवस्था के कारण संभव हो पाया है । वर्तमान में संविधान के भाग–3 में वर्णित छह मौलिक अधिकार नागरिकों को प्राप्त हैं— समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28), संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30), तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) । ये सभी अधिकार नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा की सुनिश्चितता प्रदान करते हैं ।
यद्यपि संविधान की उद्देशिका में “हम भारत के लोग” के रूप में इन आदर्शों को व्यवहार में उतारने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया गया है, किंतु उसका पूर्ण प्रतिबिंब आज सामाजिक आचरण में दिखाई नहीं देता । देश में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा नागरिक अधिकारों को लेकर व्यापक जन-जागरण हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग तो हुए हैं,परंतु कर्तव्यबोध में अपेक्षित संवेदनशीलता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है । भारत की पारंपरिक दृष्टि सदैव कर्तव्य-प्रधान रही है, किंतु वर्तमान समय में अधिकारों पर अत्यधिक बल और कर्तव्यों की उपेक्षा सामाजिक समरसता, बंधुत्व और राष्ट्रभाव के लिए चुनौती बन गई है । विधिक स्तर पर अधिकारों का पालन तो हो रहा है, परंतु सामाजिक स्तर पर आज समानता और बंधुत्व की भावना कमजोर पड़ती प्रतीत होती है ।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी ध्यान देने योग्य है कि संविधान के मूल दस्तावेज़ में सम्मिलित आदर्श चरित्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के चित्र आज सामान्य रूप से उपलब्ध संविधान प्रतियों में प्रायः देखने को नहीं मिलते। यह स्थिति संविधान निर्माता पूज्य डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के प्रति अनादर का भाव उत्पन्न करती है। जबकि संविधान के मूल दस्तावेज़ में भगवान राम, कृष्ण, हनुमान, बुद्ध, महावीर, अकबर, टीपू सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसी ऐतिहासिक एवं पौराणिक विभूतियों के चित्र अंकित थे। इसके अतिरिक्त, सिंधु घाटी सभ्यता का बैल, अशोक स्तंभ, अजंता–एलोरा की गुफाएँ तथा मोहनजोदड़ो जैसे प्रतीक भारत की प्राचीन और समृद्ध सभ्यता का सजीव चित्र प्रस्तुत करते थे ।
यह कहा जाता है कि बाद के काल में, विशेषतः 1970 के दशक में, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इन चित्रों को हटाया गया । जबकि वास्तविकता यह है कि ये चित्र आज भी संविधान के मूल दस्तावेज़ में सुरक्षित हैं और संसद में संरक्षित रखे गए हैं, किंतु बाज़ार में उपलब्ध सामान्य प्रतियों में उनका अभाव है ।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था— “भारत में वस्त्र नहीं, चरित्र महत्वपूर्ण हैं।” यदि चरित्र को उज्ज्वल बनाना है, तो प्रत्येक नागरिक को अपने आचरण में कर्तव्यबोध को पुनः स्थापित करना होगा। इसका प्रथम चरण है—संविधान का अध्ययन करना और यह समझना कि नागरिक होने के नाते मेरे कर्तव्य क्या हैं ।
संविधान के भाग 4(क) में अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है, जो भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे को सुदृढ़ करने हेतु प्रत्येक नागरिक का दायित्व निर्धारित करते हैं। साथ ही हम सभी को 'मैं' से ऊपर उठकर 'हम' की भावना से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करते हैं। इनमें संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा, समरसता और भ्रातृत्व की भावना, सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण, पर्यावरण की रक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा तथा व्यक्तिगत एवं सामूहिक उत्कर्ष हेतु सतत प्रयास जैसे कर्तव्य सम्मिलित हैं। साथ ही, माता-पिता और संरक्षकों पर अपने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व भी निहित है। संविधान निर्माताओं ने इन कर्तव्यों के माध्यम से भारत की सनातन संस्कृति और शाश्वत मूल्यों को सुदृढ़ रूप में स्थापित किया है। आज प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि वह इन कर्तव्यों का निष्ठा और दृढ़ता से स्वयं पालन करें एवं अन्य सभी को इनके प्रति जागरूक करें ।
भारत सरकार से यह विनम्र आग्रह है कि संविधान की प्रत्येक प्रति में उन प्रेरणापुरुषों और सांस्कृतिक प्रतीकों को पुनः सम्मिलित करें, जिन्हें संविधान निर्माताओं ने उसकी मूल भावना को अभिव्यक्त करने हेतु स्थान दिया था। साथ ही, जो नागरिक आज भी अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकारों का प्रभावी संरक्षण और क्रियान्वयन भी सुनिश्चित किया जाए ।
देश के प्रत्येक नागरिक से भी यह अपेक्षा है कि, जैसा आग्रह माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी करते हैं—कि “2047 में आप भारत को कहाँ देखना चाहते हैं”—उसी के अनुरूप अपने आचरण, व्यवहार और कर्तव्यों के माध्यम से भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपना योगदान दें। यही संविधान में वर्णित नागरिक कर्तव्यों की सच्ची और सार्थक अभिव्यक्ति है । कर्तव्य, राष्ट्रबोध और संविधान के प्रति हमारी निष्ठा, ही भारत को एक समृद्ध, समतावादी और मजबूत राष्ट्र बनाने का एकमात्र मार्ग है।
“ प्रज्ञादीप” सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान
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