बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले 13वें आम चुनाव में अवामी लीग की अनुपस्थिति के बीच BNP और जमात-ए-इस्लामी आमने-सामने हैं। जानें क्या है भारत-चीन एंगल और हिंदू वोटर्स की भूमिका।
By: Ajay Tiwari
Feb 09, 20264:16 PM
ढाका। स्टार समाचार वेब
बांग्लादेश में करीब 15 साल तक सत्ता पर काबिज रहीं शेख हसीना के पतन के बाद देश अपने पहले आम चुनाव के लिए तैयार है। 12 फरवरी को होने वाले मतदान से पहले पूरा देश चुनावी सरगर्मियों में डूबा हुआ है। इस बार मुकाबला त्रिकोणीय न होकर मुख्य रूप से दो पुराने सहयोगियों—बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (BNP) और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के बीच सिमट गया है।
सत्ता का नया समीकरण: हसीना-मुक्त चुनाव
शेख हसीना की अवामी लीग पर अंतरिम सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद पहली बार चुनावी मैदान में उनकी उपस्थिति शून्य है। पूर्व के चुनावों में जहाँ विपक्षी दल गिरफ्तारियों और बहिष्कार के कारण हाशिए पर रहते थे, इस बार स्थिति बिल्कुल उलट है। मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के नेतृत्व में हो रहे इन चुनावों में BNP को सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी अपने कैडर-आधारित तंत्र के साथ उन्हें कड़ी चुनौती दे रही है।
खालिदा जिया का निधन और तारिक रहमान की वापसी
BNP के लिए यह चुनाव भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के बाद उपजी सहानुभूति की लहर और उनके बेटे तारिक रहमान की 17 साल के निर्वासन के बाद वतन वापसी ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी ने अपनी 'Gen-Z' सहयोगी पार्टी (जो 2024 के छात्र आंदोलनों से निकली है) के साथ मिलकर युवाओं के बीच पैठ मजबूत की है।
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निर्णायक होंगे हिंदू और स्विंग वोटर्स
अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद उसके समर्थकों का बड़ा वोट बैंक अब 'फ्लोटिंग वोट' (स्विंग वोटर्स) बन चुका है। विशेष रूप से हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय, जो पारंपरिक रूप से अवामी लीग का समर्थक रहा है, अब दोनों दलों के निशाने पर है। जमात और BNP दोनों ही मंदिरों के दर्शन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। ठाकुरगांव के दिग्गज हिंदू नेता रमेश चंद्र सेन की जेल में मौत के बाद, दोनों दलों के शीर्ष नेताओं का उनके घर पहुँचना यह दर्शाता है कि सत्ता की चाबी अब इन वर्गों के हाथ में है।
चुनाव प्रणाली और 'जुलाई चार्टर' पर जनमत संग्रह
13वें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव के साथ-साथ इस बार एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह भी होने जा रहा है। 12 फरवरी को 299 सीटों पर पेपर बैलेट के जरिए मतदान होगा। इसके साथ ही 'जुलाई चार्टर' पर भी जनता की राय ली जाएगी। यदि यह पारित होता है, तो भविष्य की चुनी हुई सरकारों को संवैधानिक सुधारों के लिए बाध्य होना पड़ेगा।