दिल्ली के विजय चौक पर बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी संपन्न। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी की मौजूदगी में सेना के बैंड्स ने बिखेरी धुनों की छटा। जानें बेस्ट झांकी और मार्चिंग टुकड़ी के परिणाम
By: Ajay Tiwari
Jan 29, 20267:13 PM
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
विजय चौक पर बीटिंग द रिट्रीट समारोह के साथ ही गणतंत्र दिवस 2026 के चार दिवसीय आयोजनों का हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति में हुए इस कार्यक्रम में भारतीय सेना के शौर्य और देश की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिला।
समारोह की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन के साथ हुई, जिन्हें सेना ने नेशनल सैल्यूट दिया. इसके बाद तिरंगा फहराया गया और तीनों सेनाओं के बैंड ने 'कदम-कदम बढ़ाए जा' की धुन के साथ कार्यक्रम का आगाज़ किया. इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित देश का शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा.

आकृतियों और धुनों से जीता दिल
वायुसेना के बैंड्स ने आसमान में MIG-21 की आकृति बनाई, तो नौसेना ने मत्स्य यंत्र का प्रदर्शन किया. भारतीय सेना के बैंड्स ने क्रिकेट वर्ल्ड कप की आकृति उकेरकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया. गगनयान मिशन, अमर जवान और महाभारत के 'देव व्यूह' जैसी संरचनाओं ने भारत के गौरवशाली अतीत और भविष्य की झलक पेश की. कार्यक्रम का समापन पारंपरिक रूप से 'सारे जहां से अच्छा' की अमर धुन के साथ हुआ.
सांस्कृतिक विरासत को सम्मान
इस वर्ष की एक अनूठी विशेषता यह रही कि विजय चौक के सीटिंग एनक्लोजर को भारतीय वाद्य यंत्रों जैसे बांसुरी, डमरू, तबला, और शहनाई के नाम दिए गए थे. यह पहल भारत की समृद्ध संगीत परंपरा को वैश्विक मंच पर सम्मान देने के लिए की गई थी.
समारोह के दौरान परेड के विजेताओं की घोषणा भी की गई..
बेस्ट मार्चिंग टुकड़ी: तीनों सेनाओं में इंडियन नेवी को सर्वश्रेष्ठ चुना गया, जबकि CAPF कैटेगरी में दिल्ली पुलिस को प्रथम स्थान मिला.
राज्यों की झांकी: महाराष्ट्र की 'गणेशोत्सव' थीम वाली झांकी ने पहला स्थान प्राप्त किया। जम्मू-कश्मीर को दूसरा और केरल को तीसरा स्थान मिला.
मंत्रालय: संस्कृति मंत्रालय की 'वंदे मातरम' थीम वाली झांकी को बेस्ट चुना गया.

इतिहास और परंपरा
बीटिंग द रिट्रीट की परंपरा 300 साल से भी अधिक पुरानी है, जो युद्ध विराम और सूर्यास्त के बाद सैनिकों की वापसी का प्रतीक है. भारत में इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी और आज यह विश्व स्तर पर अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है.