4 जनवरी से 1 फरवरी तक माघ स्नान का शुभ अवसर। स्नान, दान, व्रत एवं हवन से पाप नष्ट होते हैं और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। प्रयाग, गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान विशेष पुण्यदाई है।
By: Star News
Jan 03, 20263:14 PM
धर्म डेस्क, स्टार समाचार वेब
भारतीय संवत्सर का 11वां चंद्रमास एवं दशमा सौर मास माघ नामक मास कहलाता है। इस माह मघा नक्षत्र युक्त परम पुण्यदाई पूर्णिमा तिथि होने से यह बात माघ मास के नाम से जाना जाता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार माघ मास स्नान का प्रारंभ पौष पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा पर्यंत होता है। पौष-फागुन मास के मध्य मकर राशि में सूर्य के परिभ्रमण के दौरान इन 30 दिनों की अवधि स्नान हेतु मोक्षदाई माने गये है। इस वर्ष माघ स्नान 4 जनवरी से प्रारंभ होकर, 1 फरवरी शनिवार,माघ पूर्णिमा को समाप्त होंगे।
पौष मास की पूर्णिमा से लेकर माघ माह की पूर्णिमा तक
यमुना, सरस्वती, कावेरी सहित अन्य जीवनदायिनी नदियों में स्नान करने से मनुष्य को पापों से छुटकारा मिल जाता है और स्वर्गलोकारोहण का मार्ग खुल जाता है। पुरातन कालों से ही गंगा या किसी बहते जल में प्रात:काल माघ मास में स्नान करना प्रशंसित रहा है। सर्वोत्तम काल वह है जब नक्षत्र भी दिख पड़ रहे हों, उसके उपरान्त वह काल अच्छा है जब तारे दिखाई पड़ रहे हों किन्तु अभी वास्तव में दिखाई नहीं पड़ा हो, जब सूर्योदय हो जाता है तो वह काल स्नान के लिए अच्छा काल नहीं कहा जाता है। मास के स्नान का आरम्भ पौष शुक्ल 11 या पौष पूर्णिमा (पूर्णिमान्त गणना के अनुसार) से हो जाना चाहिए और व्रत (एक मास का) माघ शुक्ल 12 या पूर्णिमा को समाप्त हो जाना चाहिए; कुछ लोग इसे सौर गणना से संयुक्त कर देते हैं और व्यवस्था देते हैं कि वह स्नान जो माघ में प्रात:काल उस समय किया जाता है, जबकि सूर्य मकर राशि में हो, पापियों को स्वर्गलोक में भेजता है। अर्थात पौष शुक्ल पूर्णिमा माघ स्नान की आरम्भिक तिथि है। पूरा माघ प्रयाग में कल्पवास करके त्रिवेणी स्नान करने का अंतिम दिन 'माघ पूर्णिमा' ही है। माघ पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है। स्नान पर्वों का यह अंतिम प्रतीक है।
इस पर्व में यज्ञ, तप तथा दान का विशेष महत्त्व है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन, पितरों का श्राद्ध और भिखारियों को दान करने का विशेष फल है। निर्धनों को भोजन, वस्त्र, तिल, कम्बल, गुड़, कपास, घी, लड्डू, फल, अन्न, पादुका आदि का दान करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराने का माहात्म्य व्रत करने से ही होता है। इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य की भवबाधाएं कट जाती हैं। इस वर्ष माघ माह की पूर्णिमा 1 फरवरी को होगी जिसमें माघ माह समाप्त हो जाएगा। माघ मास में प्रतिदिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, तालाब, कुआं, बावड़ी आदि के शुद्ध जल से स्नान करके भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए। पूरे माघ मास भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए नित्य ब्राह्मण को भोजन कराना, दक्षिणा देना अथवा मगद के लड्डू जिसके अंदर स्वर्ण या रजत छिपा दी जाती है, प्रतिदिन स्नान करके ब्राह्मणों को देना चाहिए। इस मास में काले तिलों से हवन और काले तिलों से ही पितरों का तर्पण करना चाहिए।
मकर संक्राति के समान ही तिल के दान का इस माह में विशेष महत्त्व माना जाता है। माघ स्नान करने वाले पर भगवान माधव प्रसन्न रहते हैं तथा उसे सुख-सौभाग्य, धन-संतान तथा स्वर्गादि उत्तम लोकों में निवास तथा देव विमानों में विहार का अधिकार देते हैं। यह माघ स्नान परम पुण्यशाली व्यक्ति को ही कृपा अनुग्रह से प्राप्त होता है। माघ स्नान का संपूर्ण विधान वैशाख मास के स्नान के समान ही होता है। सूर्य को अर्ध्य देते समय मंत्र को बोलना चाहिए-
ज्योति धाम सविता प्रबल, तुमरे तेज प्रताप।
छार-छार है जल बहै, जनम-जनम गम पाप॥
स्नान का पुराण
पौराणिक मान्यताएं है कि व्रत और दान और जप से श्रीहरि उतना प्रसन्न नहीं होते जितना माघ माह में स्नान करते हुए अपने नाम स्मरण से होते हैं। इसलिए पाप पापों से मुक्ति उत्तम लोगों की प्राप्ति तथा विष्णु कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं द्वारा माघ स्नान किया जाता है, ऐसा पद्म पुराण का मत है। मत्स्य पुराण 43/35 में स्पष्ट उल्लेख है कि माघ पूर्णिमा को जो व्यक्ति स्नान के पश्चात ब्रह्मवैवर्तपुराण का दान करता है, उसे यथानामे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुशासन पर्व में माघ स्नान की प्रशंसाओं में कहा गया है कि जिन्हें चिरकाल तक स्वर्ग में रहने की कामना हो उन्हें प्रयाग आदि तीर्थों में सूर्य के मकर गत रहने की अवधि के दौरान स्नान अवश्य करना चाहिए। माघ माह में तीर्थराज प्रयाग में तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का समागम होता है, अत: मार्ग माघ पूर्णिमा को जो इस तीर्थ में स्नान करता है वह सर्व पापों से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग लाभ प्राप्त करता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी माघ महिमा को रामचरितमानस में कुछ इस प्रकार से महिमामंडित किया है-
माघ मकर गत रवि जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी।।
स्नान की महिमा
माघ माह में स्नान एवं दान की महिमा हमारे शास्त्रों में अपरंपार बताई गई है परंतु यदि 30 दिवसीय माघ स्नान ना किए जा सके तो मात्र माघ पूर्णिमा के स्नान से संपूर्ण पुण्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जल कहीं भी हो गंगा जल के समान होता है परंतु फिर भी प्रयाग हरिद्वार कुरुक्षेत्र अथवा अन्य पवित्र नदियों एवं तीर्थों में माघ स्नान का सर्वाधिक महत्तव माना गया है। नारद पुराण की मान्यता है कि इस अवधि में गंगा स्नान कुरुक्षेत्र के समान पुण्यदाई है। काशी की गंगा सौ गुनी पुण्यदाई मानी गई है एवं काशी से भी सौ गुना अधिक पुण्य उस स्थान में बताया गया है जहां गंगा एवं यमुना का मिलन होता है। माघ माह में पश्चिम वाहिनी गंगा जो यमुना के साथ मिलती है उसमें किया गया स्नान पापनाशक होता है। गंगा एवम जमुना के संगम का जल त्रिवेणी के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें माघ माह में किया गया स्नान देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया है तो फिर मनुष्यों की बात ही क्या।
पौराणिक मान्यताएं हैं कि पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ एवं सरिताएं हैं, वे मकर राशि के सूर्य के परि भृमण की अवधि के दौरान माघ स्नान हेतु वेणी में आते हैं। ब्रह्मा विष्णु महेश रुद्र आदित्य यक्ष गंधर्व किन्नर तत्वदर्शी पुरुष पार्वती लक्ष्मी सहित समस्त देव पत्नियां नाग पत्नियां तथा पितृगण माघ माह में स्नान हेतु त्रिवेणी में आते हैं। मान्यता है कि यह समस्त तीर्थ सतयुग में सदेह यहीं स्नान हेतु आया करते थे परंतु अब कलयुग में अदृश्य रूप में स्नान करने पधारते हैं।
कहां करें स्नान
नारद पुराण के अनुसार मनुष्य अपने घर पर साठ वर्ष स्नान कर के जो पुण्य लाभ अर्जित करता है वही फल उसे सूर्य के मकर राशि में रहते हुए माघ स्नान में प्राप्त हो जाता है। सामान्य नदियों में स्नान करने से चौगुने फल की प्राप्ति होती है, दो नदियों के संगम में स्नान से 400 गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है, तथा प्रयाग की गंगा में स्नान करने से सहस्र गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है-ऐसी मान्यताएं हमारी शास्त्रों की हैं। नर्मदा के जल में माघ स्नान पापनाशक, दुख नाशक, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा शिव लोक की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। सरयू सिंधु तथा गोदावरी आदि समुद्र गामी नदियों में माघ पूर्णिमा स्नान मोक्षदाई माना गया है। पुष्कर तीर्थ में माघ स्नान से ब्रह्मा की कृपा प्राप्त होती है तो वहीं गोमती नदी में स्नान करने से पुनर्जन्म नहीं होता। महाकाल तीर्थ में माघ स्नान रूद्र लोक की प्राप्ति तथा शिव कृपा प्रदान करता है। गंगा का जल यदि सुलभ हो तो वह पाप नाशक भगवान विष्णु की कृपा देने वाला तथा मोक्ष कारक माना गया है अत: माघ माह में तीर्थराज प्रयाग में स्नान करते हुए पितरों का तर्पण करके यथासंभव दान करने से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह माघ की महिमा ही है कि 12 वर्षों के अंतराल में पड़ने वाला कुंभ मेला तथा 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुम्भ माघ माह में आता है।
कैसे करें माघ स्नान
माघ का स्नान सूर्योदय के पूर्व काल से लेकर प्रात: कालीन बेला तक विशेष प्रभावशाली माना गया है। शास्त्र सम्मति है कि माघे स्नान सूर्योदय से पूर्व हो तो अमृत तुल्य,सूर्योदय कालीन बेला में जल तुल्य, तथा सूर्योदय के पश्चात रक्त तुल्य होता है अत: माघ स्नान सूर्योदय काल में करने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह स्नान सभी जाति और समुदाय के लोगों हेतु प्रशस्त माना गया है। स्नान के पश्चात पितरों को श्रद्धा पूर्वक तर्पण देते हुए भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए तत्पश्चात ब्राह्मण एवं ब्राह्मणी के जोड़े को भोजन कराते हुए यथासंभव कंबल वस्त्र जूते रत्न एवं मुद्रा का दान करना चाहिए। इस प्रकार स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समक्ष फल प्राप्त होकर मनुष्यों के समस्त पाप ताप, दुख तथा क्लेशों का निवारण होता है।
स्नान का मंत्र
मकरस्थे रवौ माघे गोविंदच्युत माधव। स्नानेनानेन में देव यथोक्त फल प्रदो भव।।
अर्थात वासुदेव हरी कृष्ण एवं माधव नामों का स्मरण करते हुए माघ स्नान सम्पन्न करना चाहिए।
माघ माह के दौरान त्यौहार
माघ माह तीज त्योहारों के शुभ योगों से भरपूर होता है। यही कारण है कि इसकी हर तिथि में स्नान का महत्व माना गया है। इस वर्ष 4 जनवरी 2026 से माघ माह का प्रारंभ होगा और यहीं से माघ स्नान भी प्रारंभ हो जाएंगे। संपूर्ण माघ मास व्रत एवं त्यौहारों से भरा हुआ होगा।
इस प्रकार से हमने देखा कि संपूर्ण माघ मास तीज त्योहारों से भरा हुआ है। यही कारण है कि माघ माह में स्नान दान का विशेष महत्व माना गया है।
माघ मेला और कल्पवास
यूपी के तीर्थराज प्रयागराज में हर साल माघ मेला लगता है, जिसे कल्पवास कहते हैं। इसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होने के लिए आते हैं। प्रयाग में कल्पवास की परंपरा कई सदियों से निरंतर चली आ रही है। कल्पवास का समापन माघ पूर्णिमा के दिन स्नान, दान, हवन, व्रत और जप के साथ होता है। कल्पवास का अर्थ है संगम के तट पर निवास कर वेदों का अध्ययन और ध्यान करना। कल्पवास धैर्य, अहिंसा और भक्ति का संकल्प होता है। इसलिए माघ माह की पूर्णिमा पर स्नान, दान, हवन, व्रत और जप किए जाते हैं और इसी पूर्णिमा के दिन प्रयाग में गंगा स्नान करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।
माघ पूर्णिमा का ज्योतिषीय महत्त्व
जब चन्द्रमा अपनी ही राशि कर्क में होता है तथा सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में होता है, तब माघ का योग बनता है। इस योग में सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से आमने-सामने होते हैं। इस योग को पुण्य योग भी कहा जाता है। इस योग में स्नान करने से सूर्य और चंद्रमा से मिलने वाले कष्ट शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। जिस जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा नीच का है तथा मानसिक संताप प्रदान कर रहा है तो उसे सम्पूर्ण मास गंगा जल से स्नान करना चाहिए तथा अंतिम दिन दान करना चाहिए ऐसा करने से चन्द्रमा का दोष समाप्त हो जाता है। जिस जातक की कुंडली में सूर्य तुला राशि में है तथा मान-सम्मान, यश में कमी प्रदान कर रहा है तो वैसे व्यक्ति को माघ स्नान करना चाहिए तथा सूर्य भगवान को प्रतिदिन अर्घ्य देना चाहिए ऐसा करने से सूर्य से मिलने वाले कष्ट दूर हो जाते हैं। इस वर्ष माघ पूर्णिमा 1 फरवरी को संपन्न होगी।
ज्योतिषीय सलाह (राशि अनुसार माघ माह के उपाय):
भगवान विष्णु और शिव की पूजा
इस पूरे माह में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। भगवान विष्णु को तिल अर्पित करें। माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (सकट चौथ) और एकादशी (षटतिला) का व्रत रखना विशेष लाभकारी होता है।
विशेष टिप: यदि आपकी कुंडली में सूर्य कमजोर है या शनि की ढैय्या/साढ़ेसाती चल रही है, तो माघ मास में शनिवार को काले तिल का दान और रविवार को गायत्री मंत्र का जाप अवश्य करें।
ज्योतिर्विद राजेश साहनी, संपर्क 9826188606