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"युवाओं का लक्ष्य केवल नौकरी नहीं, शोध होना चाहिए"

By: Star News

Feb 22, 20266:06 PM

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"युवाओं का लक्ष्य केवल नौकरी नहीं, शोध होना चाहिए"

साक्षात्कार: दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश मिश्रा


भोपाल। स्टार समाचार वेब

अकादमिक जगत में लंबे समय से यह बहस रही है कि भारत के सामाजिक विज्ञान और इतिहास को किस चश्मे से देखा जाए? औपनिवेशिक काल की विरासत ने हमारी शिक्षा व्यवस्था और शोध की दिशा को काफी हद तक 'यूरो-सेंट्रिक' (पश्चिम केंद्रित) बना दिया था, जहाँ हम अपनी ही परंपराओं को हीन भावना से देखते आए हैं। लेकिन पिछले एक दशक से दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान इस धारणा को बदलने और भारतीय ज्ञान परंपरा को 'इंडो-सेंट्रिक' (भारत केंद्रित) बनाने के भगीरथ प्रयास में जुटा है। यह बात संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश मिश्रा ने स्टार डिजिटल ब्यूरो चीफ देवाशीष उपाध्याय से विशेष साक्षात्कार में कही। साक्षात्कार के मुख्य अंश:

सवाल - दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के बारे में बताइए?

जवाब - यह संस्था सामाजिक विज्ञान के अध्ययन के लिए समर्पित है। इसकी स्थापना के पीछे बड़ा उद्देश्य यह था कि भारत की अकादमिकता को भारत-दृष्टि केंद्रित बनाना। भारत केंद्रित अनुसंधान को बढ़ावा देना और जो यह कर रहे हैं उन्हें एक प्लेटफॉर्म पर लाना। ऐसे विषय जो अब तक अछूते रहे हैं, जिन पर चर्चा नहीं हुई, उन्हें सामने लाना। सामाजिक विज्ञान के अध्ययन में जो 'गैप' हैं उन्हें भरना। यह संस्था यही काम पिछले 10 वर्षों से कर रही है। इसके कार्यों और उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आईसीएसएसआर से भी यह मान्यता प्राप्त है। औपनिवेशिक युग के कारण हमारे देश की अकादमिकता का अधिकांश भाग पश्चिम केंद्रित है। 'यूरो-सेंट्रिक' से 'इंडो-सेंट्रिक' बनाना ही इस संस्थान का मुख्य कार्य है।

सवाल - आपका रुझान भी रिसर्च में रहा है। आपको इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

जवाब - कहाँ से प्रेरणा मिली यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन जब मैं अपने विद्यार्थी जीवन में काम कर रहा था, उस समय बहुत से लोग ऐसे मिले जिनसे संवाद और चर्चा के बाद यह समझ में आया कि देश में कुछ अलग करने की जरूरत है, खासकर शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में। फिर ऐसा अवसर आया कि इस संस्थान की स्थापना हो रही थी और जब मुझे इसके बारे में पता चला तो यह मेरे लिए 'सोने पर सुहागा' था। मैं कई वर्षों से यह सोच रहा था कि भारत का जो 'सेंटर ऑफ ग्रेविटी' वर्तमान में यूरो-केंद्रित है, उसको भारत-केंद्रित बनाना है। मुझे इस संस्था के माध्यम से यह अवसर मिला कि मैं यह काम कर सकूँ। प्रेरणा कई महानुभावों से मिली—कभी स्वामी विवेकानंद को पढ़कर तो कभी श्री अरविंद को, तो कभी वासुदेव शरण अग्रवाल, क्षितिज मोहन सेन, कुबेरनाथ राय और दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के विचारों से प्रेरणा मिली।

सवाल - भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर आपकी इतनी रिसर्च है। क्या कुछ ऐसा है जो आपको लगता है कि लोगों तक पहुँचना चाहिए लेकिन अभी तक नहीं पहुँचा?

जवाब - सबसे महत्वपूर्ण बात जो लोगों को पता होनी चाहिए, वह है अपनी 'दृष्टि' के बारे में। उनकी अपनी दृष्टि कैसी है, क्या वे यह जानते हैं? जिस दिन आप यह जान जाएंगे, आप सही दिशा में चलने लगेंगे। कोई अगर गलत कामों में संलिप्त है तो वह जानबूझकर नहीं है, बल्कि उसकी दृष्टि वैसी बन चुकी होती है। तब उसे गलत भी सही लगने लगता है। सारा मामला दृष्टि का है। मेरा मानना है कि लोगों को सबसे पहले अपने बारे में जानना चाहिए। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा यही कहती है कि 'स्वयं को जानो' और अपनी यात्रा करो। आपके हिस्से में ईश्वर ने क्या काम दिया है, जब आप यह जान जाएंगे और दृष्टि विकसित हो जाएगी, तब अपनी संस्कृति, परंपरा और मान्यताओं के प्रति आपकी एक सकारात्मक दृष्टि हो जाएगी। हमारे विश्वविद्यालयों में वर्षों तक ऐसी शिक्षा व्यवस्था रही जिसने आपको अपने बारे में ही हीन बताने की कोशिश की और आपको एक ऐसी दृष्टि दी जहाँ आप अपनी ही चीजों को हीनता से देखें। यदि हम अपनी परंपराओं को अपनी आँखों से देखें, अपने पुरखों की आँखों से देखें और उसकी सकारात्मकता को समझें, तो चित्र अलग होगा। भारत कोई केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है, जैसा अटल जी ने भी कहा था—यह एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक राष्ट्र है, जहाँ सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है। हमारे पुरखों ने हमें बहुत महत्वपूर्ण परंपरा दी है और उसको समझना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।

सवाल - आज के समय में किसी भी संस्कृति को सुरक्षित रखना कितना मुश्किल काम है?

जवाब - कोई मुश्किल काम नहीं है। कोई भी चीज़ कठिन नहीं है यदि आप एक बार समझ गए कि इसे बचाना ही चाहिए। कठिनाई तभी तक है जब तक हम केवल उसे कठिन कहते रहते हैं; जब करना शुरू कर देंगे तो कठिनाई खत्म हो जाएगी। जिसे लगता है कि हमारी संस्कृति का संरक्षण कठिन है, उसे अपने घर से शुरुआत करनी चाहिए। यदि आपने अपने घर-परिवार में अपनी संस्कृति को सुरक्षित कर लिया, तो पूरे देश की संस्कृति सुरक्षित हो जाएगी। हमारे पूर्वजों ने किसी अलग यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर संस्कृति का संरक्षण नहीं किया था, उन्होंने अपने घर-परिवार और गाँवों में ही इसे बचाकर रखा था।

सवाल - युवाओं को कोई सुझाव जो रिसर्च से जुड़ना चाहते हैं?

जवाब - मैं यही कहूँगा कि सबसे पहले वे अपना लक्ष्य तय करें। उन्हें देश के लिए कुछ करना है। देश के लिए कुछ करने का मतलब केवल सीमा पर जाकर गोली चलाना ही नहीं होता, देश के अंदर भी बहुत काम है। यदि आप शोध, अकादमिकता या शिक्षा के क्षेत्र में हैं, तो केवल यही लक्ष्य मत रखिए कि आपका 'नेट' क्वालीफाई हो जाए और आप कहीं असिस्टेंट प्रोफेसर बन जाएँ। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि अपने लिए एक लक्ष्य जरूर तय करें—नौकरी नहीं, शोध। जीवन में एक शोध लगातार करते रहना है। अगर आपने यह एक काम कर लिया तो आप इस देश को बहुत कुछ देकर जाएंगे। युवाओं को भटकना नहीं चाहिए। एक विषय तय करिए और उस पर काम करिए। उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए कोई जनजातीय युवा विश्वविद्यालय में पीएचडी करने आया है, अब उसे ऐसा टॉपिक पकड़ा दिया गया जिससे उसका कोई जुड़ाव ही नहीं है, तो उसे यह समझना है कि उसके गाँव में भी बहुत विषय हैं। उसकी अपनी जातीय अस्मिता में भी बहुत विषय हैं। मान लीजिए कोई गोंड समाज से है या कोई कोरकू विद्यार्थी है, तो वह कोरकू परंपराओं, गीतों, कहानियों और कहावतों का संरक्षण करे जो खत्म हो रही हैं। अगर यह समझ लिया कि यह मेरा ही काम है, तो फिर वह बहुत कुछ कर सकता है। एक लक्ष्य तय कर शोध की दिशा में आगे बढ़ें, तो आप उस विषय के विशेषज्ञ भी बनेंगे और उसके साथ न्याय भी कर पाएंगे।


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