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साप्ताहिक कॉलम.. स्टार स्ट्रेट.. सुशील शर्मा की कलम से

हर रविवार साप्ताहिक कॉलम

By: Star News

Mar 15, 20265:38 PM

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साप्ताहिक कॉलम.. स्टार स्ट्रेट.. सुशील शर्मा की कलम से

  • सुशील शर्मा

भाजपा दफ्तर में अब कांच नहीं, गोपनीयता का राज

भाजपा अक्सर अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का दावा करती रही है, लेकिन प्रदेश भाजपा कार्यालय में हाल के दिनों में जो बदलाव हुए हैं, उसने गलियारों में नई तरह की फुसफुसाहट शुरू कर दी है।दरअसल, भाजपा के नए पदाधिकारियों के आने के बाद कार्यालय के कई कक्षों में लगे ट्रांसपेरेंट कांच अब पारदर्शी नहीं रहे। पहले इन कांचों के जरिए बाहर से यह साफ दिखाई देता था कि कमरे के भीतर क्या गतिविधि चल रही है। कार्यकर्ता गलियारे से गुजरते हुए अपने नेताओं को काम करते हुए देख भी लेते थे और कई बार नजरें मिल भी जाती थीं।अब हालात बदल गए हैं। इन पारदर्शी कांचों पर ऐसी फिल्म चढ़ा दी गई है कि बाहर से अंदर का नजारा पूरी तरह ओझल हो गया है। यानी अब कमरों के भीतर क्या चल रहा है, यह बाहर खड़े कार्यकर्ताओं को दिखाई नहीं देता। कार्यालय के भीतर इसका तर्क भी दिलचस्प दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जब कार्यकर्ता गलियारे से गुजरते हुए कमरों की तरफ देखते थे तो भीतर बैठे पदाधिकारियों का ध्यान भटक जाता था। इसलिए “कामकाज में एकाग्रता” बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कार्यकर्ताओं की नजर से ही बचना है तो फिर पार्टी की वह पारदर्शिता कहां गई, जिस पर अक्सर गर्व किया जाता है? आखिर जिन कार्यकर्ताओं के दम पर संगठन खड़ा होता है, उनसे ही अगर कमरे का नजारा छिपाना पड़े तो चर्चा तो होगी ही।


इतने सस्ते कलेक्टर कहां मिलेंगे!

विंध्य क्षेत्र की प्रशासनिक गलियों में इन दिनों एक कलेक्टर साहब खासे चर्चा में हैं। वजह उनके फैसले नहीं, बल्कि उनकी “दरियादिली” बताई जा रही है। चर्चा यह है कि साहब इतने “सुलभ” हैं कि थोड़ी-सी रकम में ही कई कामों की फाइलें तेजी से दौड़ने लगती हैं। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि जनाब ने मानो कलेक्टरी नहीं, कोई छोटी-सी दुकान खोल रखी हो, जहां “रेट लिस्ट” भले सार्वजनिक न हो, पर काम कराने वालों को रास्ता अच्छी तरह मालूम है। दिलचस्प बात यह है कि कलेक्टर साहब की यह “ख्याति” अब सिर्फ जिले तक सीमित नहीं रही। फुसफुसाहटें राजधानी के मंत्रालय के पांचवें माले तक भी पहुंच चुकी हैं। वहां बैठे बड़े अफसरों के कानों में भी यह चर्चा धीरे-धीरे गूंजने लगी है कि विंध्य में एक कलेक्टर साहब “बहुत किफायती” साबित हो रहे हैं।  अब देखना यह है कि साहब इन शिकायतों का इलाज कैसे करते हैं सफाई देकर मामला ठंडा करते हैं या फिर ऊपर बैठे लोग ही उनका “ट्रांसफर ऑर्डर” लिखकर इस दुकान पर ताला लगवा देते हैं। बता दें साहब का ज़िला टाइगर को लेकर भी ख्याति प्राप्त है फिलहाल तो प्रशासनिक गलियारों में यही तंज घूम रहा है कि इतने सस्ते कलेक्टर आजकल मिलते कहां हैं!

कांग्रेस का ‘लीगल सेल’ कानून बाद में, लापरवाही पहले

लोकतंत्र में चुनाव केवल वोटों का खेल नहीं होता, यह राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का सवाल भी होता है। खासकर जब मामला उपचुनाव का हो तो सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के विजयपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने एक अलग ही “रिकॉर्ड” बना दिया जीतकर भी हारने का। कहानी बड़ी दिलचस्प है। कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीत गए, लेकिन बाद में पता चला कि हलफनामे में ही गड़बड़ी हो गई। बस, यहीं से पूरी जीत की कहानी उल्टी पड़ गई और मामला अदालत तक पहुंच गया। नतीजा जिस सीट पर कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया था, वही विधायकी हाथ से फिसल गई। अब बड़ा सवाल यह है कि जब फार्म भरा जा रहा था तब कांग्रेस का तथाकथित “लीगल सेल” कहां था? कांग्रेस अध्यक्ष की टीम कहां थी? नेता प्रतिपक्ष की पूरी फौज किस काम में व्यस्त थी? चुनाव में जहां बूथ से लेकर बैलेट तक रणनीति बनाई जाती है, वहां एक साधारण कानूनी दस्तावेज की जांच तक नहीं हो पाई। लगता है कि कांग्रेस का लीगल सेल शायद नाम का ही रह गया है।दिलचस्प यह भी है कि अब जब मामला हाथ से निकल चुका है तो कुछ जिम्मेदार लोग अदालत पर ही तंज कसने में जुट गए हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या कभी अपनी ही गिरेबान में झांकने की फुर्सत मिलेगी?आखिर लोकतंत्र में चुनाव लड़ना केवल भाषण देने का काम नहीं होता, कागजों की दुनिया भी उतनी ही गंभीर होती है। और विजयपुर ने यह सबक कांग्रेस को कुछ ज्यादा ही महंगा देकर याद दिलाया है।

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