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परमहंस सच्चिदानंद महाराज के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जन सैलाब

सतना जिले के प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र धारकुंडी आश्रम के संस्थापक परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज की पार्थिव देह अंतिम दर्शन के लिए आश्रम में रखी गयी।

By: Ajay Tiwari

Feb 08, 20266:32 PM

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परमहंस सच्चिदानंद महाराज के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जन सैलाब

  • मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, डिप्टी सीएम भी पहुंचे
  • सोमवार को आश्रम परिसर में होगी समाधि

सतना. स्टार समाचार वेब

सतना जिले के प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र धारकुंडी आश्रम के संस्थापक परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज की पार्थिव देह अंतिम दर्शन के लिए आश्रम में रखी गयी। महाराजश्री के अंतिम दर्शन करने विंध्य और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में अनुयायी आश्रम पहुंचे। भक्त अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए व्याकुल दिखे, समूचा आश्रम 'स्वामी जी अमर रहें' के जयघोष से गूंज उठा।

मुख्यमंत्री और दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

महाराज श्री के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सवा पांच बजे हेलीकॉप्टर से धारकुंडी पहुंचे। इसके पहले उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने आश्रम पहुँचकर महाराज श्री के चरणों में पुष्प अर्पित किए। उन्होंने इस क्षति को आध्यात्मिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के अलावा राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी, सांसद गणेश सिंह, चित्रकूट विधायक सुरेंद्र सिंह गहरवार नगर निगम परिषद के पूर्व अध्यक्ष सुधीर सिंह तोमर और संजय पटारिया सहित कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक आश्रम पहुंचे और श्रद्धासुमन अर्पित किए। 

स्वयं चुनी थी समाधि की भूमि

कहा जा रहा है कि स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने अपने जीवनकाल में ही अपनी समाधि का स्थान स्वयं चुन लिया था। सोमवार को आश्रम के गर्भगृह में पूर्ण वैदिक विधि-विधान और संतों की उपस्थिति में उन्हें समाधि दी जाएगी। इस ऐतिहासिक और भावुक क्षण का साक्षी बनने के लिए उनके गुरु भाई, सक्तेशगढ़ आश्रम के प्रख्यात संत स्वामी अडगड़ानंद महाराज भी धारकुंडी पहुँच चुके हैं। साथ ही श्री श्री 1008 रामायण महाराज और विजय महाराज सहित देश भर से कई अन्य संत भी वहाँ उपस्थित हैं।

धारकुंडी: प्रकृति और अध्यात्म की तपोस्थली

धारकुंडी आश्रम अपनी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन महत्ता के लिए जाना जाता है। घने जंगलों के बीच स्थित यह स्थान अघमर्षण तीर्थ के रूप में विख्यात है, जिसका संबंध पांडवों के वनवास काल से माना जाता है। यहाँ की अविरल जलधारा (धार) और पवित्र कुंडी आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है। चित्रकूट की 84 कोस परिक्रमा का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था जुड़ी हुई है।

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