साप्ताहिक कॉलम


"अपने तो अपने होते हैं..."—इस मशहूर फिल्मी गाने को अगर थोड़ा ट्विस्ट दें तो बात यूं बने—"सपने तो बस सपने होते हैं..." और यह लाइन प्रदेश के एक साहबजादे डीसीएम साहब पर कुछ ज़्यादा ही फिट बैठती है। इन जनाब का ख्वाब था कि उनके आगे से 'डी' हटे और 'सीएम' अकेले बच जाए! एक तरफ दिल्ली के गलियारों में जमावड़ा जमाया तो दूसरी तरफ उम्मीद की डोर थामे रहे कि शायद कोई चमत्कार हो जाए... लेकिन अफसोस! अब वो चमत्कारी बेला नहीं आई, उल्टा सपना चटक गया। अब अपनी ही मंडली में बैठकर दिल का हाल यूं बयां कर रहे हैं कि "दिल्ली अब मोहन के सम्मोहन में है... और वो उन्हें ही सिर-माथे बिठाए रखना चाहती है।"

प्रदेश में निज़ाम बदले काफी समय हो गया है, लेकिन कुछ आला अफसरान अब भी ‘पुराने दिन’ नहीं भूल पाए हैं। दरअसल, सत्ता बदल सकती है, लेकिन अफसरशाही के दिलों से ‘पुरानी श्रद्धा’ नहीं जाती। हाल ही में एक बड़े सरकारी कार्यक्रम की अतिथि सूची तैयार की जा रही थी। जिम्मेदारी दी गई थी एक वरिष्ठ और अनुभवी अफसर को, जो वर्षों से सत्ता के हर रंग-रूप देख चुके हैं। इन्होंने सूची बनाई, सजाई और सबसे ऊपर—पुराने निज़ाम का नाम चमका दिया। सूची जब मौजूदा सत्ता केंद्र तक पहुंची तो नया निज़ाम बगैर नाम लिए ऐसा ‘स्क्रैच’ किया कि बाबू साहब की स्याही तक सूख गई। कहने को तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी ‘मौन मुस्कान’ और बाबू साहब की “यस सर, बिल्कुल सर…” वाली हड़बड़ी बहुत कुछ कह गई। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सत्ता की कुर्सी बदल सकती है, लेकिन अफसरों के मन में बैठा पुराना ‘वाद’ आसानी से नहीं उतरता।

प्रदेश में इन दिनों दो चीज़ों का बड़ी बेसब्री से इंतजार था—मानसून और तबादला लिस्ट। बारिश तो दुल्हन की तरह शरमाती-गिरती आ गई, लेकिन तबादलों की लिस्ट अब भी पांचवीं मंज़िल की खिड़की से नीचे झांकने को तैयार नहीं है। कलेक्टरों, एसपी साहबों, और एनेक्सी के दिग्गज अफसरों की धड़कनें इसी लिस्ट की धुरी पर टिक गई हैं। सूत्र बताते हैं कि लिस्ट में गहमागहमी इतनी ज्यादा है कि हर नाम जोड़ने या हटाने के साथ कोई ना कोई ‘सियासी सेंसर’ एक्टिव हो जाता है। अब सवाल यह है कि ये लिस्ट इतनी जटिल कैसे हो गई? राजनीतिक खेमेबाज़ी, क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और मंत्रालयीय हित—इन सबको साधते-साधते यह लिस्ट अब 'दशावतार' बन गई है। एनेक्सी से लेकर मंत्रालय और कंपोजिट भवन तक अफसरान अपने-अपने ‘स्रोतों’ से लिस्ट की अंतिम रचना जानने में लगे हैं, पर अब तक जवाब वही है—"ऊपर से कुछ नहीं उतरा है!"

राजनीति में विचारधारा स्थायी नहीं होती, और मप्र इसका ताज़ा उदाहरण बन चुका है। यहां के कई वामी और मध्यमार्गी चिंतक, जो अब तक दक्षिणमार्गियों की वैचारिक आलोचना को ही अपना धर्म मानते थे, अब उन्हीं के सरकारी मंचों पर 'रामनाम' जपते नजर आ रहे हैं। जी हां! कभी लोहिया और मार्क्स की विचारधारा पर चलने वाले ये 'बौद्धिक योद्धा' अब सरकार के जयघोष में ताली पीटते दिख रहे हैं। सरकारी मंच सज रहे हैं, और इन पर वही लोग विराज रहे हैं जिन्हें कल तक इन मंचों के पास फटकने नहीं दिया जाता था। इस 'बदलते बौद्धिक भूगोल' को लेकर भीतर ही भीतर बहुतों की भौंहें तनी हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में इसे 'नए दौर की नई स्वीकार्यता' कहा जा रहा है। सरकार की नजर में यह "वामी का वैचारिक पुनर्जन्म" है—जो अब रामधुन गाकर 'राज्याभिषेक' का आनंद उठा रहे हैं।

हाल ही में जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मिले, तो उनकी मुलाकात की एक तस्वीर वायरल हुई। तस्वीर देखने में सामान्य थी, लेकिन जो लोग राजनीति की 'टेबल डिप्लोमेसी' समझते हैं, उनके लिए इसमें एक गहरा संदेश छिपा था। पीएम और सीएम के बीच रखी टेबल पर मप्र सरकार द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकें रखी थीं—“सदानीरा” और “जलधरा।” ये पुस्तकें महज़ किताबें नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सोच की प्रस्तुति हैं। मप्र सरकार के संस्कृति विभाग के अधीन वीरभारत न्यास द्वारा प्रकाशित ये पुस्तकें देश में पहली बार नदियों के आरोग्य, संस्कृति, और परंपरा पर केंद्रित शोधपरक ग्रंथ हैं। तस्वीर में इन पुस्तकों की मौजूदगी यह भी दर्शाती है कि मुख्यमंत्री न केवल विकास कार्यों को ले जा रहे हैं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक विरासत को भी दिल्ली दरबार तक पहुँचा रहे हैं। कह सकते हैं—अब मप्र की नदियां न केवल प्रदेश में, बल्कि दिल्ली की राजनीतिक धारा में भी प्रवाहित हो रही हैं!
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