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दिल्ली से आएंगे नए सीएस!

भोपाल के पावर कॉरिडोर में इन दिनों सबसे गर्म चर्चा यही है कि ‘अगला सीएस कौन?’। अफसरशाही के गलियारों से लेकर सियासी अड्डों तक सबकी जुबान पर एक ही सवाल, क्या मौजूदा मुख्य सचिव भी अपने पूर्ववर्ती की तरह एक्सटेंशन लेकर आ पाएंगे या फिर कुर्सी पर नया खिलाड़ी आएगा? अंदरखाने की फुसफुसाहट कहती है कि सीएम मोहन यादव की ताजा दिल्ली यात्रा रंग लाई है। चर्चाओं में एक 1991 बैच के कद्दावर अफसर का नाम तेजी से घूम रहा है, जो लंबे समय से दिल्ली में तैनात हैं और अब सीधे मध्य प्रदेश में प्रशासनिक कमान संभाल सकते हैं। कहा तो ये भी जा रहा है कि सीएम और साहब की कॉफी टेबल मीटिंग हो चुकी है। अब तो ये तक सुना जा रहा है कि जैसे ही साहब मध्यप्रदेश आएंगे, उनकी मैडम की भी गृह प्रदेश वापसी पक्की मानी जा रही है।
मध्यप्रदेश वाकई अजब भी है और गजब भी। मंत्रालय में झांककर देखिए, 90 हजार करोड़ का भारी-भरकम बजट संभालने वाला विभाग आजकल एक अकेले बाबू और बाकी आउटसोर्स कर्मचारियों के सहारे चल रहा है। किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, पद सब खाली, फाइलें ढेर, और आउटसोर्स वालों के हाथ में पूरा खजाना! अब सोचिए, जब नौकरशाही की रीढ़ ही गायब हो और ‘ठेका कर्मी’ ही मालिक बन बैठे हों, तो फाइलें कहाँ से कहाँ पहुंचेंगी, इसका हिसाब कौन रखेगा? कहते हैं, ‘जिम्मेदारी वही जिसकी जवाबदेही हो’... लेकिन यहां तो आउटसोर्स के कांधे पर कोई बोझ ही नहीं। फाइल चाहे अलमारी में धूल खाए या सीधे कहीं और उड़ जाएं पूछने वाला कोई नहीं। यानी, मध्यप्रदेश का जल से जुड़ा विभाग फिलहाल ‘बाबू भरोसे’ और ‘आउटसोर्स’ के सहारे चल रहा है।
भाजपा के गलियारों में फिर से ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का फॉर्मूला घूम रहा है। मुख्यमंत्री निवास पर प्रदेशाध्यक्ष और संगठन महामंत्री की बैठक के बाद यह सिद्धांत फिर से टेबल पर आ चुका है। लेकिन राजधानी भोपाल की हवा तो कह रही है ‘भाजपा में एक पद के साथ दूसरा पद का फॉर्मूला रसूखदारों पर लागू नहीं होता।’ हकीकत भी यही है राजधानी में ही पार्टी के जिला अध्यक्ष पार्षद भी हैं, एमआईसी सदस्य भी। नगर निगम में तो ‘मल्टी-टास्किंग पार्षदों’ की लाइन लगी है। एक हाथ से निगम की फाइलें निपटा रहे हैं और दूसरे हाथ से संगठन का झंडा उठा रहे हैं। प्रदेश संगठन में कई विधायक भी संगठन की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अब सवाल यह है। क्या नेता खुद नैतिकता दिखाकर एक पद से इस्तीफा देंगे? या फिर पार्टी का कठोर डंडा गिरेगा? राजनीतिक पंडित तंज कस रहे हैं ‘भाजपा में एक व्यक्ति, दो पद परंपरा है’ और ‘एक पद फॉर्मूला’ सिर्फ उपदेश।’

भाजपा में ‘एक पद, दो पद’ का झमेला चल रहा है, तो कांग्रेस भी कहां पीछे है! मध्य प्रदेश कांग्रेस का संगठन सृजन अभियान तो ऐसा निकला जिसने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को ठेंगा दिखा दिया। समीकरण ऐसा बैठाया गया कि सरकार आएगी तो वही लोग मंत्री बनेंगे, सरकार नहीं होगी तो वही लोग संगठन में भी हावी रहेंगे। महाकाल की नगरी उज्जैन में तो हद ही हो गई, लोकसभा, विधानसभा और महापौर का चुनाव लड़ने वाले चेहरे को ही संगठन की कमान दे दी गई। अब बताइए हार-जीत से मतलब नहीं, पद तो वही ले उड़े। जब सोशल मीडिया पर इस फैसले की खिल्ली उड़ी, तो संगठन अध्यक्ष को सख्ती दिखानी पड़ी। लेकिन कार्यकर्ताओं का सवाल बड़ा सीधा है ‘भैया, फेसबुक-ट्विटर से तो आप आक्रोश हटवा लोगे, पर जमीनी कार्यकर्ताओं के दिल का गुबार कैसे मिटाओगे?’ राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट है कि ‘मध्यप्रदेश के पार्टी क्षत्रप, राहुल गांधी की आंख के नीचे से काजल चुरा लाए!’ यानी हाईकमान को भी भनक नहीं लगी और खेल हो गया।
और अंत में...
साहब का अनआम्फिशियल सेक्रेटरी?
मध्य प्रदेश की एक पावरफुल उपमुख्यमंत्री का सरकारी दरबार इन दिनों चर्चा में है। वजह क्या है? सरकारी मीटिंगों में जहां केवल जिम्मेदार अफसरों को होना चाहिए, वहां एक रिटायर्ड अधिकारी बड़े ठाठ से हाजिरी बजा रहे हैं। कहते हैं कि यह साहब मंत्रीजी के विश्वासपात्र हैं और फाइलों से लेकर फैसलों तक, हर जगह अपनी राय ठोकते रहते हैं। पर खबर है कि विभागीय अधिकारी अब चुपचाप बगावत के मूड में हैं। सुनने में आ रहा है कि कुछ अफसर सरकार के मुखिया और संगठन में शिकायत पहुंचाने का रास्ता टटोल रहे हैं, ताकि इस अनआॅफिशियल सेक्रेटरी को दरबार से रुखसत करवा दिया जाए।

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कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है।
साक्षात्कार ... राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा।
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बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।
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मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं।