मध्य प्रदेश में एक माननीय अधिकारी का अपनी गाड़ी से घायलों को अस्पताल पहुंचाना, जबकि उन्होंने ही 108 एंबुलेंस सेवा शुरू की थी। क्या है 108 सेवा से अविश्वास का कारण? जानें सांठगांठ और टैक्स चोरी का पूरा मामला।

सुशील कुमार शर्मा

मध्य प्रदेश में कुछ माननीयों के बंगले ने तो रिटायर्ड स्टाफ का ‘आश्रयधाम’ ही खोल दिया है। हालत ये है कि जो कर्मचारी अपनी सरकारी पारी खेल चुके थे, अब वही मंत्री जी के खास साज-बाजू बनकर फिर से उसी मंत्रालय में चाय की चुस्कियों के साथ फाइलों पर ‘अघोषित मुहर’ लगवा रहे हैं और इनसे परेशान विभाग के कार्यरत सेवक हैं। बहरहाल पुराने घोड़े को फिर से घुड़दौड़ में उतारना भला कहां की अक्लमंदी? यह तो माननीय ही जानें, किंतु बुंदेलखंड से आने वाले भारी भरकम माननीय के यहां सेवाएं दे रहे मःत्रालय की सेवा से रिटायर दरबारी जो गुल खिला रहे हैं, उसकी आंच से माननीय के तप का कभी भी तर्पण हो सकता है। साहब के दुलारे रिटायर दरबारी पर चारित्रिक दोष की परत इतनी मोटी बताई जा रही है कि कोई भी दिन बंगले को हेडलाइन बना सकता है और बंगले की फुसफुसाहट कहती है कि अगर ये फूस के ढेर में चिंगारी पड़ी तो मंत्री जी की कुर्सी भी धू-धू कर सकती है। अब तक मंत्री जी ने जो भी विभाग संभाला, कोई न कोई बेमौसम आफत साथ ले ही आए। लेकिन इस बार यह ‘रिटायर्ड मंडली’ अगली आफत का निमंत्रण-पत्र है, जो नियंत्रित नहीं हुआ तो निपटा भी सकता है।

साहब के साथ यह यह अजब संयोग है वे जब-जब सड़क पर निकले, उनके काफिले को हादसे में घायल सड़क पर पड़े कराहते हुए जरूर मिले और दोनों बार साहब ने सरकारी 108 एंबुलेंस सेवा को फोन करने की बजाय अपनी गाड़ी से खुद घायलों को अस्पताल पहुंचाया। अब सवाल ये नहीं कि साहब इतने ‘दरियादिल’ क्यों हैं… असली सवाल ये है कि जिस 108 सेवा को साहब ने ही बतौर बड़े साहब रहते चालू कराया था, उसी पर अब भरोसा क्यों नहीं? जानकार कहते हैं कि एंबुलेंस सेवा 108 किस सांठगांठ का नतीजा है, यह साहब से बेहतर कौन जानता है। साहब के सबसे भरोसेमंद अफसर के समय शुरू हुई इस सेवा का संकल्प छत्तीसगढ़ की कंपनी को तमाम विरोध के बावजूद क्यों दिया गया था। मेहरबानी भी इतनी की छत्तीसगढ़ में पंजीकृत एंबुलेंस चलवाकर मप्र सरकार के परिवहन विभाग को टैक्स का चूना भी लगने दिया गया। अब यह मेहरबानी मुफ्त में हुई नहीं होगी और रही बात परफारमेंस की तो इससे तो मीडिया ने बार- बार अगवत कराया है। इसलिए साहब को भी पता है कि सिस्टम पर भरोसा करेंगे तो कहीं फिर से सवाल उन्हीं पर न लौट आएं। इसलिए आजकल फॉर्मूला साफ़ है — 108 पे भरोसा नहीं, अपनी गाड़ी और अपनी निगरानी पे भरोसा!

कुछ लोग इंजीनियरिंग से पुल बनाते हैं और कुछ ‘कनेक्शन’ से कलेक्शन! मध्य प्रदेश के एक खास विभाग में तैनात कार्यपालन यंत्री साहब आजकल चुपचाप नहीं, बल्कि ‘कलेक्शन’ के सुरों में गूंजते हुए चर्चा में हैं। कहा जा रहा है कि साहब की दो ही चीजें लाजवाब हैं। उनका कलेक्शन और उनका कनेक्शन। अब बताइए, जिस मंत्री महोदया के कलेक्शन स्किल्स खुद सुर्खियों में रहे, उनके पीछे पर्दे के पीछे जो असली खिलाड़ी था, वो कोई और नहीं, हमारे यही इंजीनियर साहब थे। विभाग के अय्यर बताते हैं कि साहब की 'वसूली-विद्या' ऐसी है कि बड़े-बड़े अफसर भी मुरीद हैं। तभी तो हर बड़ा कलेक्शन इन्हीं को सौंपा जाता है। मजाल है कि एक रुपया भी इधर-उधर हो जाए। कहते हैं, जब टारगेट पूरा हो जाता है तो ऊपर से जो ‘आशीर्वाद’ गिरता है, वही इंजीनियर साहब के लिए प्रसाद होता है। इतने 'क्लीन' कि न दूध में मिलावट, न पैसे में। सबसे कमाल की बात? साहब कांग्रेस की सरकार में मंत्री जी के बंगलानवीस होते हुए भरोसे मंद रहे और अब भाजपा सरकार में भी पदस्थ भले न हो पर भरोसा कायम है। पहले वाले मंत्री के समय भी यही ‘संकलन सेवा’ देते थे और अब वर्तमान मंत्री जी के साथ भी उसी मिशन पर हैं। हाल ही में जब एक कलेक्शन मामले ने विभाग और मंत्री को टीवी की हेडलाइन बना दिया, तो सबकी सांसें अटक गईं। पर कलेक्शन एजेंट साहब? जैसे कुछ हुआ ही न हो! कोई उठापटक नहीं। एकदम सुरक्षित।

राजनीति में शगुन-अपशगुन कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब नया दौर है… यहाँ वास्तु दोष भी सीधा सत्ता के सिंहासन को हिला रहा है। बात हो रही है मध्य प्रदेश सरकार के उस आलीशान दफ्तर की, जिसे नौकरशाही की भाषा में VB-2 कहा जाता है। यह वही बहुचर्चित भवन है, जहां से प्रदेश का शासन-प्रशासन संचालित होता है। लेकिन अब धीरे-धीरे यह इमारत खुद ही चर्चा में आ गई है। कारण? उसका पांचवां माला। कहते हैं, इस मंज़िल पर जो भी बैठा है, वह दोबारा सत्ता तक नहीं लौट पाया। 2019 से लेकर अब तक VB-2 की कुर्सी पर बैठने वाले मुखियाओं के पुनरागमन की स्कीम अब तक फेल ही रही है। और अब तो ‘ज्ञानीजन’ कान में फुसफुसाने लगे हैं “साहब, VB-2 का पंचम तल अपशगुनी है…!” जानकार बताते हैं कि मौजूदा मुखिया को भी ये बात कान में धीरे से सुना दी गई है। लेकिन ठहरिए यह कोई आम नेता नहीं हैं। ये तो महाकाल के अनन्य भक्त हैं, श्रद्धा और संकल्प की एक नई परिभाषा। इन्होंने कई राजनीतिक मिथकों को तोड़कर दिखाया है। हालांकि अंदरखाने इसकी खबर है कि साहब के शुभचिंतकों ने पांचवें माले की वास्तुदोष के निराकरण का कार्य प्रारंभ कर दिया है। अब देखना ये होगा कि क्या VB-2 का 'वास्तु वॉर' किसी नए अध्याय को जन्म देगा, या फिर, माननीय इस मिथक को मिथ्या साबित कर देंगे..

जब से प्रदेश की सत्ता के गलियारों में VB-2 का ‘पंचम दोष’ चर्चा में आया है, तब से हर कुर्सी और हर कोना संदेह के घेरे में आ गया है। अब खबर आ रही है कि सिर्फ मुख्यमंत्री का कक्ष ही नहीं, उनके कार्यालय के नए प्रशासनिक मुखिया का कमरा भी ‘दोषी’ पाया गया है यानी वास्तु दोषी! कहते हैं, जिस कुर्सी पर साहब बैठते हैं, वह अब तक कई बार बदली जा चुकी है। नहीं-नहीं, कुर्सी टूटी नहीं है, मुखिया ही बदलते जा रहे हैं। और अब इस सिलसिले को भी वास्तु से जोड़ दिया गया है। सूत्रों की मानें तो साहब को धीरे-धीरे एहसास हो गया है कि मामला सिर्फ फाइलों की गति या सीएम की कृपा का नहीं है शायद कुर्सी की दिशा ही गलत है। इसलिए अब प्रशासनिक मुखिया भी कक्ष शुद्धि अभियान में जुट गए हैं।

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जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
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रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
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