दिग्गज अभिनेता सतीश शाह का किडनी फेलियर के कारण निधन हो गया है। फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने इस खबर की पुष्टि की। जानें सतीश शाह के करियर और उनकी यादगार फिल्में 'DDLJ', 'मैं हूँ ना' के बारे में।

मुंबई. स्टार समाचार वेब. एंटरटेंमेंट डेस्क
भारतीय सिनेमा और टेलीविजन जगत के जाने-माने अभिनेता सतीश शाह का निधन हो गया है। फिल्म निर्माता और निर्देशक अशोक पंडित ने इस दुखद खबर की पुष्टि की है। किडनी फेलियर के कारण शनिवार दोपहर को उन्हें मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने अंतिम साँस ली।
अशोक पंडित ने दी जानकारी
फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट साझा करते हुए अभिनेता के निधन की खबर सार्वजनिक की। उन्होंने लिखा, "बेहद दुख और सदमे के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि हमारे प्रिय मित्र और शानदार कलाकार सतीश शाह अब हमारे बीच नहीं रहे। किडनी फेल होने के कारण उनका कुछ घंटे पहले देहांत हो गया। उन्हें तत्काल हिंदुजा अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। यह हमारे उद्योग के लिए एक अपूरणीय क्षति है। ओम शांति।"
सतीश शाह का जन्म 25 जून 1951 को मुंबई में हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान अभिनय की ओर था। उन्होंने अपनी अभिनय की शिक्षा प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से पूरी की, जो उनके सफल करियर की आधारशिला बनी। 1970 के दशक के अंत में फिल्मों में कदम रखने के बाद, सतीश शाह ने 200 से अधिक फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं। उन्हें विशेष रूप से लोकप्रिय टीवी शो 'साराभाई वर्सेस साराभाई' में इंद्रावदन साराभाई के किरदार के लिए जाना जाता है। उनकी कुछ प्रमुख फिल्मों में 'जाने भी दो यारो' (1983), 'मासूम' (1983), 'हम आपके हैं कौन' (1994), 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995), 'कभी हां कभी ना' (1994), 'कल हो ना हो' (2003), 'ओम शांति ओम' (2007), 'मैं हूं ना' (2004), और 'रा.वन' (2011) शामिल हैं। उनके निधन से भारतीय मनोरंजन उद्योग में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
सतीश शाह की दिलचस्पी बचपन में क्रिकेट और बेसबॉल जैसे खेलों में अधिक थी, लेकिन अभिनय के क्षेत्र में उनकी एंट्री अनायास ही हुई। यह तब की बात है जब सतीश स्कूल में थे और वार्षिक उत्सव के लिए एक नाटक की तैयारी चल रही थी। नाटक में कलाकारों की कमी होने के कारण, उनके अध्यापक ने उनका नाम दे दिया। अपने शिक्षक का विरोध न कर पाने के कारण, सतीश ने नाटक में हिस्सा लेने का फैसला किया।
शुरुआत में, सतीश को डायलॉग याद करने में दिक्कत नहीं हुई, लेकिन जब उन्हें मंच पर या किसी के सामने बोलना होता, तो वह घबराकर भूल जाते थे। उनकी इस घबराहट को देखते हुए, उनके अध्यापक ने उन्हें एक महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने सतीश से कहा, "किसी को देखो मत, बस एक्टिंग करो।"
अध्यापक की इस सलाह को मानते हुए, सतीश शाह ने मंच पर अपनी पहली बेहतरीन अदाकारी पेश की। इस अनुभव ने उन्हें प्रेरित किया और इसके बाद उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने अभिनय की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। यहीं से उनके शानदार अभिनय करियर की नींव रखी गई।
सतीश शाह के बचपन का एक किस्सा बेहद चौंकाने वाला है। एक बार वह पार्क में खेल रहे थे, तभी खेल-खेल में एक बच्चे ने उनकी आँखों में धूल झोंक दी। अनजाने में, सतीश ने अपनी आँखों को ज़ोर से हथेलियों से रगड़ दिया। धूल के नुकीले कणों के कारण उनकी आँखों की पुतलियों पर खरोंचें आ गईं।
जब उनके पिता को इस घटना का पता चला, तो वे तुरंत उन्हें डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने इलाज के बाद उनके पिता को बताया कि अगर वे थोड़ी देर और करते, तो सतीश की आँखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती थी। सही समय पर मिले उपचार ने उनकी आँखों की रोशनी बचा ली। यह घटना सतीश शाह के जीवन का एक ऐसा पड़ाव था, जो बताता है कि वे कितने भाग्यशाली रहे।
सतीश शाह ने अपने अभिनय करियर में ‘जाने भी दो यारों’ और ‘साराभाई वर्सेज़ साराभाई’ जैसे कई यादगार किरदारों को जीवंत किया।

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