"स्टार स्ट्रेट" में पढ़ें मध्य प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही के गलियारों से निकली दिलचस्प और अनसुनी खबरें। सुशील शर्मा की कलम से जानें कि कैसे तबादलों की अंदरूनी कहानी ने सबको चौंकाया और क्या है मंत्री के स्टाफ में चल रही उठापटक की असली वजह। यह लेख उन नेताओं और अधिकारियों की बात करता है जिनकी रणनीतियां और समीकरण हर दिन बदलते हैं।


राजनीति में कद बढ़े तो जलन तो होगी ही...लेकिन दिक्कत तब हो जाती है जब यह कद अपने घर के आंगन से निकलकर दूसरे राज्यों के बरामदे में झंडा गाड़ने लगे! मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों हलचल कुछ ऐसी ही है। विपक्षी खेमे के कुछ दिग्गज नेताओं की रातों की नींद इसलिए उड़ गई है, क्योंकि पार्टी के मुखिया के रिश्तेदार साहब अब सिर्फ़ प्रदेश के साथ पैन-इंडिया प्लेयर बनने लगे हैं। महाराष्ट्र में भी उन्हें जिम्मेदारी मिली औऱ बिहार में भी दायित्व मिल गया। विरोधियों ने माथा पकड़ लिया अब मुखिया के रिश्तेदार युवा नेताजी मप्र के साथ बाहर भी खेलेंगे? वैसे चिंता 'दायित्व' से नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक समझदारी से है, जो रिश्तेदार साहब के खून में बह रही है, क्योंकि ये महोदय जब भी पार्टी परिवार के राष्ट्रीय युवराज और उनकी बहना या उनके विश्वासपात्र दौरे पर आते हैं, तो साहब वहां व्यवस्था देखने के बहाने पहले से मौजूद रहते हैं। और वहीं से बनता है उनका हाई-लेवल कनेक्शन सीधा ऊपर तक! अब प्रदेश के कुछ नेता इस “तार” से इतने झल्ला गए हैं कि विरोधियों से गठजोड़ करने को मजबूर होना पड़ा। गठजोड़ बन गया है सुना है कि एक्शन प्लान भी बनाया है। देखना ये है कि प्लान सफल कैसे होता है।

जब नए अध्यक्ष की ताजपोशी हुई, तो सरकार के मुखिया ने मुस्कुराते हुए कहा था कि अब संगठन में हेमंत ऋतु आ गई है...खूब तालियां बजीं, चेहरे खिले... और कुछ ने तो मोबाइल पर गूगल कर हेमंत ऋतु का मतलब भी तलाश लिया? लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को एहसास होने लगा कि यह ऋतु खुशनुमा ठंड नहीं, बल्कि सियासी सर्द हवाओं वाली है...और फिर पार्टी दफ्तर में कानाफूसी शुरू हो गई कि हेमंत ऋतु नहीं भाई, ये तो पतझड़ का मौसम लग रहा है! दरअसल, नए मुखिया ने कुर्सी संभालते ही जो तेवर दिखाए, उससे कई नेताओं की "आराम कुर्सी" हिल गई। अनुशासनहीनों को तलब कर लिया गया, गणेश परिक्रमा करने वालों को साफ चेताया गया कि अब चक्कर कम काटो, काम ज़्यादा करो! अब जिनके लिए संगठन ‘सेवा भाव’ से ज़्यादा 'सेटिंग भाव' था, उनके लिए ये हेमंत ऋतु भारी पड़ रही है। मीठी ठंड की आस में आए नेता अब ठिठुरते फिर रहे हैं। कुछ पुराने भाजपाई तो फुसफुसाते सुनाई दिए हेमंत ऋतु तो साहित्य में सुंदर मानी जाती है, पर राजनीति में ये पतझड़ जैसी क्यों लग रही है? जवाब में किसी अनुभवी ने बस इतना कहा "जब संगठन में सफाई होती है, तो पुराने पत्ते गिरते ही हैं साहब...तभी तो नई कोंपलें फूटती हैं!

मंत्रालय की गलियों में एक अलिखित परंपरा चलती आई है एक वरिष्ठ अफसर, दूसरे वरिष्ठ की सलाह को नज़रअंदाज़ नहीं करते। लेकिन इस बार ये बात-बात की तहजीब किनारे रख दी गई। हुआ यूं कि एक अनुभवी अफसर, जो अब आदेश जारी करने वाले विभाग से विदा ले चुके हैं, जाते-जाते एक चेतावनी छोड़ गए। नई कुर्सी पर बैठे साहब को बताया गया "फलां कर्मचारी दिखता भले सरकारी हो, लेकिन काम करता है राजनीतिक संगठन के लिए... और उसकी महत्वाकांक्षा पद से बड़ी है।" लेकिन नई आमद वाले साहब ने वो सलाह पढ़ी जरूर, पर रख दी फाइल की किसी दराज में। नतीजा? उसी कर्मचारी को अपने स्टाफ में शामिल कर लिया... यह वही कर्मचारी हैं जिनकी राजनीतिक 'लालसा' के चलते एक मंत्री स्टाफ से हटाए गए थे और मज़े की बात ये कि यह कहानी सत्ता दल के मातृ संगठन के कानों तक भी पहुँच चुकी है। अब मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि साहब ने कर्मचारी तो चुन लिया और मातृ संगठन की नाराज़गी भी साथ में खरीद ली?" अब देखना ये है कि मातृ संगठन इस "गुस्ताखी" को "साहब की स्वतंत्र कार्यशैली" मानता है या "संकेत की अवहेलना"

मप्र के प्रशासनिक मुखिया पेपरलेस सिस्टम के फरमान ने मंत्रालय के कई विभागों में काम की गति तो बढ़ा दी, लेकिन शहर सरकार से जुड़े विभाग के प्रशासनिक मुखिया का पर्सनल स्टाफ इस डिजिटल क्रांति में सबसे पहले डिजिटल डाउन हो गया है। क्योंकि ये साहब शायद डिजिटल से डरे हुए हैं तभी लागिन पासवर्ड भी छिपाकर रखा है। अब तक अफसर अपने भरोसे के स्टाफ को अपना पासवर्ड दे देते थे ताकि फाइलों का मूवमेंट सुचारू चले। लेकिन साहब बोले स्टाफ पर कम सिस्टम पर ज्यादा भरोसा है। इसलिए पर्सनल स्टाफ दिनभर कुर्सी पर बैठा रहता है ना मेल खोल सकते, ना फाइल देख सकते, ना आदेश भेज सकते! और शाम होते-होते साहब पूछते हैं कि बताओ, आज क्या किया? स्टाफ बोल सकता नही कि साहब जब आपने ही सिस्टम की चाबी अपने तक रख ली, तो तिजोरी खोलें कैसे? बेबस, कर्मचारी रोएं तो किससे? साहब न सुनने को तैयार, न समझने को...और ऊपर से ‘कामचोरी’ का तमगा भी वहीं लगाते हैं। उधर साहब की छवि सिस्टम सख्त, अनुशासन पक्का। इधर स्टाफ की हालत, कुर्सी पर बैठकर दिन काटो, और शाम को जवाब दो कुछ किया या नहीं? अब मंत्रालय में कहावत चल पड़ी है यह डिजिटल युग का नया अध्याय है जहां बिना पासवर्ड के कर्मचारी भी ‘लॉग आउट’ हो रहे हैं।
चलते-चलते..

मप्र के मुखिया के वाक चातुर्य का भी जवाब नहीं है...साहब, पूर्व मुखिया साहब के गृह जिले में औद्योगिक कार्यक्रम में गए थे। वहां मंचासीन नगर के जनप्रतिनिधि का परिचय ऐसे दिया कि कसीदे में कटाक्ष का खोल मिला हुआ था...साहब ने कहा कि आप तो स्वदेश हैं वैसे तो देश बहुत बड़ा है पर आप तो स्वदेश वाले हो, पूरा देश आपका है, क्या इछावर क्या सीहोर, क्या आष्टा और क्या हमारा बुदनी। सारा सीहोर आपका है आपके हवाले वतन साथियों। साहब के इस तरह के परिचय पर वहां के बुद्धिविलासी जन स्वदेशी के मजे ले रहे हैं कि साहब ने कसीदे गढ़ते हुए भी चौंटिया ली या है या दी है चेतावनी... क्योंकि महोदय शिवभक्त है और उनकी प्रेरणा से ही कमल के हुए हैं।

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ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति में अपनी गहरी पैठ रखने वाले रामनिवास रावत ने हाल ही में कांग्रेस का दशकों पुराना साथ छोड़ भाजपा का दामन थामकर सियासी गलियारों में हलचल मचा दी थी।
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केंद्र सरकार 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के लिए नई जनगणना और परिसीमन की अनिवार्य शर्तों को हटाने की तैयारी कर रही है।
मध्य प्रदेश की स्थापना के 70 वर्षों का यह विस्तृत कालखंड अनेक नेतृत्वों की विकासगाथाओं से आलोकित रहा है। इन दशकों में विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रदेश को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया।
मध्यप्रदेश नेतृत्व चाहता है कि राज्य की सीटों पर स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता मिले। इससे कई पुराने और समर्पित कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गए हैं।
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हाल ही की एक समीक्षा बैठक में प्रदेश के मुखिया ने मैदानी अफसरों पर जिस अंदाज में तंज कसा, उसके बाद कई अफसरों की सीटी-पुट्टी गुम बताई जा रही है।