भारतीय जनता पार्टी के लिए संगठन कभी भी केवल पदों की राजनीति नहीं रहा, वह विचारधारा और अनुशासन का स्तंभ है। किंतु मध्यप्रदेश में कुछ नेताओं ने इसे सत्ता तक पहुंचने की वैकल्पिक सोड़ी समझ लिया था।

सुशील शर्मा
भारतीय जनता पार्टी के लिए संगठन कभी भी केवल पदों की राजनीति नहीं रहा, वह विचारधारा और अनुशासन का स्तंभ है। किंतु मध्यप्रदेश में कुछ नेताओं ने इसे सत्ता तक पहुंचने की वैकल्पिक सोड़ी समझ लिया था। उनका लक्ष्य था सरकार से बाहर रहकर संगठन की कमान हासिल करना और फिर वहीं से सत्ता को नित्रित करना, किंतु मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव ने चुपचाप लेकिन चतुराई से ऐसी बिसात बिछाई, जिससे यह सपना केवल टूटा नहीं, बल्कि भविष्य की अटकलों के लिए विराम लगा गया।
डॉ. मोहन यादव को जब मुख्यमंत्री बनाना मना था, तब पार्टी के भीतर ही कुछ स्वर यह मानकर चल रहे थे कि वह निर्णय 'स्थानी' नहीं है। उन्हें 'कमजोर विकल्प', 'स्थानीय समीकरण या समझौते का चेहरा' कहकर भी आंका गया। इसी का फायदा उठाकर सता और संगठन को वे ध्रुवों की तरह खड़ा कर देने वाले कुछ चेहरों को यह उम्मीद थी कि दिल्ली दरबार में असंतोष की नकली फुसफुसाहट से वे संगठन की कमान हासिल कर लेंगे। लेकिन डॉ. मोहन यादव ने एक 'विरोधाविहीन' और 'प्रतिस्पर्धारहित नियुक्ति के जरिए न केवल संगठन में समन्वय स्थापित कया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि पार्टी की आंखों में अब वही नेता विश्वसनीय है, जो सत्ता और संगठन दोनों को साथ लेकर चलता है, ना कि टकराव की राजनीति करता है।
डॉ. मोहन यादव ने हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश अध्यक्ष (घोषणा की औपचारिकता शेष है) बनवाकर पार्टी के भीतर कई संदेहों और साजिशों पर विराम लगाना है। वह नियुक्ति उस समय आई जब संगठन के भीतर कई नाम घूम रहे थे, जिनमें कुछ ऐसे भी थे जो टीवी फ्रेंडली चेहरों के रूप में देखे जा रहे थे। लेकिन भाजपा हाईकमान ने एक बार फिर उसी परंपरा को दोहराना, जिसमें मुख्मंत्री की पसंद को तवज्जो दी जाती है, जैसे 1990 में पटवा जी ने कैलाश जोशी को चुनौती देकर लखीराम अग्रवाल को अध्यक्ष बनवाना था और 2007 में शिवराज ने मात्र दस महीने में तत्कालीन अध्यक्ष सत्यनारायण जटिया की विदाई कराकर नरेंद्र सिंह तोमर को खंडेलवाल की नियुक्ति केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि 'संगठन में संवाद, समाज में संतुलन और नेतृत्व में स्थायित्व' का संदेश है।
खंडेलवाल न केवल वैश्य समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि आदिवासी बहुल क्षेत्र बैतूल से आते हैं, जहां उनको जमीन से जुड़ी छवि और राजनीतिक विरासत मजबूत रही है। उनके माध्यम से जातीय और क्षेत्रीय संतुलन दोनों साधे गए हैं और साथ ही यह भी तय किया गया कि अब संगठन की कमान भरोसेमंद हाथों में रहेगी।
यह फैसला उन नेताओं के लिए भी एक सख्त संदेश है, जिन्होंने हाल के महीनों में संगठन के माध्यम से सरकार दबाव बनाने या खुद को अगले मुख्यमंत्री के दावेदार के में प्रस्तुत करने की रणनीति बनाई थी। मोहन यादव ने बिना किसी टकराव के केवल एक नियुक्ति से यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी अब किसी समानांतर शक्ति केंद्र को गुंजाइश नहीं छोड़ रही। हाईकमान का मध्यप्रदेश के लिए यह एक सीधा संदेश है कि पार्टी में अब सत्ता से अलग संगठन नहीं, बल्कि सरकार संगठन एक ही रथ के दो पहिए होंगे। यह गठजोड़ मुख्यमंत्री की सोच और शैली से संचालित होगा, ना कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से अब प्रदेश भाजपा में कोई असमंजस, कोई दुविधा या 'कौन चला रहा है' जैसे सवाल नहीं बने हैं। दिल्ली ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मोहन यादव न केवल सरकार चला रहे हैं, बल्कि अब संगठन को भी उन्हीं के साथ चलना है। हेमंत खंडेलवाल के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है कि एक ओर संगठन में अनुशासन और स्पष्ट दिशा सुनिश्चित करना, दूसरी ओर सरकार की जनहित योजनाओं को कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज तक पहुंचाना। कांग्रेस जैसे विपक्षी दल भाजपा किसी भी चूक पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। ऐसे में संगठन एकता, मर्नाया और अनुशासन, सत्ता की सबसे बड़ी ताकत बनेंगे और सत्ता और संगठन अब एक लग में चलेंगे, एक स्वर में बोलेंगे और एक दिशा में बढ़ेंगे और इस संगति का सूत्रधार अब निर्विवाद रूप से एक ही नाम है डॉ. मोहन यादव।

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