3 दिसंबर-1984 की रात विश्व इतिहास में दर्ज सबसे भयावह औद्योगिक लापरवाही का प्रतीक है। मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) जैसी अत्यंत विषैली गैस ने कुछ ही घंटों में हजारों लोगों की जान ले ली। लेकिन मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

भोपाल गैस त्रासदी के घाव आज भी ताजा हैं।
कमलाकर सिंह
भोपाल गैस त्रासदी केवल एक बीती हुई दुर्घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को झकझोर देने वाली वह सच्चाई है, जिसके घाव आज भी ताजा हैं। जुलाई-2025 में जब मध्य प्रदेश के धार जिले के पीथमपुर में स्थित ट्रीटमेंट स्टोरेज डिस्पोजल फैसिलिटी में 337 मीट्रिक टन जहरीले कचरे के निस्तारण की घोषणा हुई, तो इसे आधिकारिक रूप से आपदा प्रबंधन की अंतिम प्रक्रिया माना गया, लेकिन असलियत यह है कि त्रासदी का अंत कागजों पर जरूर लिखा गया, पीड़ा पर नहीं। यह आपदा अब भी भोपाल की हवा में सांस ले रही है, उसके बच्चों में जन्म ले रही है और उसके पीड़ितों की आंखों में आज भी जलती है।
3 दिसंबर-1984 की रात विश्व इतिहास में दर्ज सबसे भयावह औद्योगिक लापरवाही का प्रतीक है। मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) जैसी अत्यंत विषैली गैस ने कुछ ही घंटों में हजारों लोगों की जान ले ली। लेकिन मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका। विभिन्न अधिकृत और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुमान बताते हैं कि करीब 22,000 से अधिक लोगों की मृत्यु इस विषैली गैस के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण हुई। पांच लाख से अधिक लोग आज भी फेफड़ों की बीमारी, आंखों की क्षति, नर्वस सिस्टम की गड़बड़ी, कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिन बच्चों का जन्म उस रात के वर्षों बाद हुआ- वे भी इस अदृश्य जहर के वारिस बने। गैस-प्रभावित माता-पिता से जन्मे बच्चों में जन्मजात विकार, मानसिक-शारीरिक विकास अवरोध और असंख्य चिकित्सकीय जटिलताएं आज भी दर्ज की जा रही हैं। यह त्रासदी पीढ़ियों में आगे बढ़ चुकी है-मानो मौत ने स्वयं अपना वंश ययां स्थापित कर लिया हो।
आर्थिक रूप से यह आपदा उन समाजों को और गहरा तोड़ गई जो पहले ही संघर्षरत थे। जिन परिवारों में कमाने वाला व्यक्ति मर गया या अशक्त हो गया, वहां गरीबी, भूख और बेबसी ने स्थायी घर बना लिया। महिलाओं और बच्चों ने दोहरी-तीहरी मार झेली-बीमारी की, गरीबी की और असुरक्षा की। इस सामाजिक-आर्थिक पीड़ा पर न तो पर्याप्त संवेदनशीलता दिखाई गई और न ही दीर्घकालिक पुनर्वास की कोई प्रभावी, समग्र और दूरंदेशी योजना लागू की गई।
दूसरी तरफ वैश्विक कॉरपोरेट सिस्टम की निर्ममता दिखाई दी। यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) की ओर से एमआईसी गैस के प्रभावों और शामिल रसायनों की जानकारी छिपाई गई, जिससे उपचार की प्रारंभिक कोशिशें कमजोर पड़ गईं। आज तक उस पूरी रासायनिक संरचना को सार्वजनिक नहीं किया गया, जो उस रात वातावरण में फैली थी। 1989 में भारत सरकार ने पीड़ितों से समुचित विचार-विमर्श किए बिना मात्र 470 मिलियन डॉलर में समझौता कर लिया- जो शुरू में मांगी गई राशि का लगभग 15 प्रतिशत था। इसके कारण हजारों गैस-प्रभावित बच्चे और उस समय नाबालिग रहे अनेक पीड़ित पूरी तरह नजरअंदाज कर दिए गए। मुआवजे की सूची मानो बिना आवाज वालों को चुपचाप बाहर कर देने की सूची बन गई।
इसके बाद जिम्मेदारी का खेल और जटिल हो गया। यूसीसी को खरीदने वाली डॉव केमिकल ने कानूनी दलीलों के माध्यम से आज भी स्वयं को इस त्रासदी से अलग बताने का प्रयास किया है। यह सवाल अब भी अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के सामने चुनौती बनकर खड़ा है-लाभ का उत्तराधिकार स्वीकार और दायित्व का इंकार-क्या यह न्याय कहलाता है? भारत में 2010 में कुछ भारतीय अधिकारियों को दोषी करार दिया गया, पर विदेशी जिम्मेदार व्यक्तियों और कंपनियों पर अभी भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। यदि जिम्मेदारी भी सीमाओं और पासपोर्ट के साथ बंटती हो, तो मानवाधिकार किस शासन-व्यवस्था की शरण में जाएं?
किन्तु इस अंधकार में भी एक अटूट रोशनी है- पीड़ितों का संघर्ष। 41 वर्षों से उनका धैर्य, साहस और असहमति पूरे विश्व के लिए मिसाल है। न थकने वाला सत्याग्रह, अदालतों में निरंतर लड़ाई और समाज की मदद से चिकित्सा-उपचार की वैकल्पिक व्यवस्था-यह सब दिखाता है कि अत्याचार से भी बड़ी शक्ति इंसान की जिजीविषा है।
संभावना ट्रस्ट क्लिनिक और चिंगारी रिहैबिलिटेशन सेंटर जैसे संस्थानों ने हजारों प्रभावित बच्चों और वयस्कों को वह चिकित्सा-सहायता दी, जिसकी गुणवत्ता आज भी सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों से बेहतर मानी जाती है। ये संस्थान केवल इलाज नहीं, बल्कि उम्मीद का पुनर्जन्म हैं। यह संघर्ष विश्व-समुदाय से यह भी कह रहा है कि डॉव और संबंधित कंपनियां-चाहे जितना बचने की कोशिश करें-भोपाल उन्हें बार-बार पुकारता रहेगा, उनसे सवाल पूछता रहेगा।
भोपाल का सबक बहुत स्पष्ट है- कोई औद्योगिक विकास मानव जीवन की कीमत पर नहीं हो सकता। कोई राष्ट्र तब तक सुरक्षित नहीं हो सकता जब तक उसके नागरिक सुरक्षित न हों। वक्त आ गया है कि वैश्विक कानूनों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोई भी कॉरपोरेट इकाई इंसानियत से ऊपर अपनी सत्ता न बना सके। पर्यावरणीय न्याय और कॉरपोरेट जवाबदेही को अंतरराष्ट्रीय कानून के केन्द्रीय स्तंभों के रूप में पुनर्परिभाषित किए बिना, भोपाल जैसी त्रासदियां केवल ‘दुर्घटनाएं’ नहीं, बल्कि सुनियोजित लापरवाहियां बनकर दोहराई जा सकती हैं।
41 साल बाद भी भोपाल इंतजार में है... न्याय का... पुनर्वास का... सम्मान का। सच्चाई यह है-त्रासदी समाप्त नहीं हुई है, उसे बस आंकड़ों और फाइलों में दफनाने का प्रयास हुआ है। भोपाल आज भी यही कहता है-जब तक अन्याय का अंत नहीं होता, तब तक इतिहास शांत नहीं होता।
लेखक- पूर्व कुलपति, भोपाल हैं।


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