वर्ष 2026 की शुरुआत ने वैश्विक राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ अमेरिका अपनी ऊर्जा और व्यापारिक नीतियों के माध्यम से नए वैश्विक मानकों को परिभाषित कर रहा है।

कमलाकर सिंह
जनवरी 2026 की शुरुआत ने वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक और असहज मोड़ उपस्थित कर दिया है। लैटिन अमेरिका से लेकर दक्षिण एशिया तक, अमेरिका की नीतियाँ अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे सीधे सत्ता संरचनाओं, ऊर्जा संसाधनों और व्यापारिक प्रवाह को पुनर्परिभाषित करने का माध्यम बनती जा रही हैं। वेनेजुएला में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के माध्यम से सत्ता परिवर्तन और भारत पर रूसी तेल को लेकर बढ़ता शुल्क दबाव—ये दोनों घटनाएँ अलग-अलग प्रतीत होते हुए भी एक ही मूल तर्क से जुड़ी हैं: ऊर्जा पर नियंत्रण के माध्यम से वैश्विक प्रभाव स्थापित करना।
वेनेजुएला में तीन जनवरी 2026 को घटित घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया। अमेरिकी विशेष बलों ने राजधानी काराकास में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरस को हिरासत में लेकर न्यूयॉर्क पहुँचाया, जहाँ उन पर मादक पदार्थ तस्करी और नार्को-आतंकवाद से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने डेल्सी रोड्रिग के नेतृत्व में एक अंतरिम प्रशासन को मान्यता दे दी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो इस अंतरिम व्यवस्था के साथ सक्रिय संवाद में हैं, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वेनेजुएला पर अमेरिकी निगरानी कुछ वर्षों तक जारी रह सकती है।
इस सत्ता परिवर्तन का केंद्रीय तत्व वेनेजुएला का विशाल तेल भंडार है। अमेरिका ने न केवल तेल टैंकरों को जब्त किया, बल्कि अंतरिम प्रशासन के साथ तीस से पचास मिलियन बैरल कच्चे तेल के हस्तांतरण का समझौता भी किया है। इस तेल से होने वाली आय अमेरिकी नियंत्रण वाले बैंक खातों में जमा की जाएगी। औपचारिक रूप से कुछ प्रतिबंध बनाए रखे गए हैं, किंतु तेल के परिवहन, बिक्री तथा तेल क्षेत्र से जुड़े उपकरणों के आयात पर चुनिंदा ढील यह संकेत देती है कि प्रतिबंध अब नीति का लक्ष्य नहीं, बल्कि दबाव बनाए रखने का साधन बन चुके हैं। वेनेजुएला के लिए यह स्थिति राष्ट्रीय संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता के बीच एक गहरे द्वंद्व का रूप ले चुकी है।
इसी समय, भारत और अमेरिका के संबंध भी एक जटिल दौर से गुजर रहे हैं। रणनीतिक और रक्षा सहयोग के स्तर पर दोनों देशों के बीच निकटता बनी हुई है। रक्षा क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान, सह-निर्माण और तकनीकी साझेदारी जारी है, तथा अमेरिका भारत के लिए कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। इसके बावजूद, व्यापारिक मोर्चे पर संबंधों में तीखा तनाव दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि नई दिल्ली, वाशिंगटन की इस मांग को नहीं मानती कि वह रूस कच्चे तेल की खरीद को रोके या उसमें भारी कटौती करे, तो भारत पर और अधिक आयात शुल्क लगाए जा सकते हैं। पिछले वर्ष अमेरिका ने इसी आधार पर भारतीय वस्तुओं पर आयात शुल्क को दोगुना करते हुए पचास प्रतिशत कर दिया था। अब यह संकेत भी दिए जा रहे हैं कि रूसी तेल और गैस के व्यापार से जुड़े देशों पर द्वितीयक शुल्क पाँच सौ प्रतिशत तक बढ़ाए जा सकते हैं, जिसका सीधा प्रभाव भारत के निर्यात, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
व्यापार संबंधी शोध संस्था ‘वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल’ के अनुसार, भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क में से लगभग आधा रूसी कच्चे तेल की खरीद से संबंधित है। प्रतिबंधों के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने आयात में कुछ कमी अवश्य की है, लेकिन पूरी तरह से खरीद बंद नहीं की गई है। परिणामस्वरूप भारत एक ऐसी रणनीतिक अनिश्चितता की स्थिति में फँसा हुआ है, जहाँ न तो वह अपने ऊर्जा हितों को पूरी तरह त्याग सकता है और न ही अमेरिकी दबाव की अनदेखी कर सकता है। विशेषज्ञों का मत है कि अब अस्पष्टता की नीति कारगर नहीं रह गई है, किंतु यह भी स्पष्ट है कि पूर्ण रोक लगाने के बाद भी अमेरिकी दबाव अन्य व्यापारिक मांगों के रूप में सामने आ सकता है।
वेनेजुएला के घटनाक्रम पर भारत ने एक संतुलित और सतर्क कूटनीतिक रुख अपनाया है। किसी देश का नाम लिए बिना,नई दिल्ली ने संवाद और शांति का आग्रह किया, जो यह दर्शाता है कि भारत इस बदलती वैश्विक परिस्थिति में टकराव के बजाय संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।
वस्तुतः वेनेजुएला और भारत—दोनों उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में ऊर्जा अब केवल आर्थिक संसाधन नहीं रही, बल्कि सत्ता, दबाव और कूटनीति का प्रमुख औज़ार बन चुकी है। कहीं यह प्रत्यक्ष सत्ता परिवर्तन के रूप में सामने आती है, तो कहीं आयात शुल्क और व्यापारिक प्रतिबंधों के रूप में। वर्ष 2026 की यह शुरुआत संकेत देती है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और संप्रभुता के प्रश्न और अधिक तीखे होंगे। ऐसे में देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे दबाव और स्वायत्तता के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करते हैं,क्योंकि अब तेल केवल ईंधन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की भाषा बन चुका है।
लेखक पूर्व कुलपति , भोपाल हैं

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