2023 में कांग्रेस के टिकट पर जीतीं निर्मला सप्रे अब भाजपा के मंचों पर दिखती हैं, पर औपचारिक सदस्यता नहीं ली। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने उन्हें पार्टी का विधायक मानने से इनकार कर दिया है। 90 दिन तक फैसला न होने पर कांग्रेस ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कराने के लिए इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जानें पूरा घटनाक्रम।

फाइल फोटो
मध्य प्रदेश की राजनीति में सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे की स्थिति लगातार अनिश्चितता के घेरे में बनी हुई है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार सदन में पहुँची सप्रे, अब भाजपा के मंचों पर सक्रिय रूप से दिखाई देती हैं, लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता अब तक नहीं ली है।
इस "अनिर्णय" की स्थिति के बीच, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सार्वजनिक रूप से सप्रे से किनारा कर लिया है। सप्रे के दल को लेकर पूछे गए सवाल पर खंडेलवाल ने स्पष्ट किया कि "निर्मला सप्रे भाजपा के 164 विधायकों की सूची में शामिल नहीं हैं।" उन्होंने आगे कहा कि "भाजपा में सांगठनिक अनुशासन सर्वोपरि है, और पार्टी की सदस्यता लिए बिना कोई व्यक्ति आधिकारिक रूप से भाजपा से नहीं जुड़ सकता।" उन्होंने यह सवाल सप्रे पर ही छोड़ दिया कि वह किस दल में हैं।
यह विवाद लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान तब शुरू हुआ, जब सप्रे राहतगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के साथ मंच पर नजर आईं। वहाँ मंच से घोषणा की गई कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली है, और उन्हें भाजपा का गमछा पहनाया गया था। सप्रे ने भी 'बीना के विकास के लिए भाजपा के साथ आने' की बात कही थी। हालांकि, इस सार्वजनिक घोषणा के बावजूद उन्होंने कांग्रेस से पूरी तरह दूरी बना ली और भाजपा उम्मीदवार लता वानखेड़े के लिए प्रचार करती रहीं, लेकिन औपचारिक सदस्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं की।
निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की माँग अब हाईकोर्ट तक पहुँच गई है।
विधानसभा के मानसून सत्र (7 जुलाई 2024) के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष को सप्रे की सदस्यता समाप्त करने के लिए आवेदन दिया था।
करीब ढाई महीने बाद जवाब आया कि याचिका के दस्तावेज गुम हो गए थे, जिसके बाद सिंघार ने पुनः आवेदन और दस्तावेज भेजे।
दल-बदल के मामले में 90 दिन तक कोई फैसला न होने पर, 28 नवंबर 2024 को कांग्रेस ने इंदौर हाईकोर्ट का रुख किया।
अब हाईकोर्ट ने इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष, राज्य सरकार और स्वयं निर्मला सप्रे तीनों से जवाब माँगा है, जिससे यह कानूनी और राजनीतिक विवाद और भी उलझ गया है।

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