सतना के रैकवार दंपत्ति ने बेटियों के जन्म को पौधरोपण से जोड़कर सामाजिक मिसाल पेश की है। 500 से अधिक पौधे रोपकर बेटी और प्रकृति दोनों को सहेजने का संदेश दिया।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
बालिका यानि बेटी के जन्म पर अक्सर घरों में खुशियां कम मनाई जाती हैं लेकिन सतना के रैकवार दंपत्ति बेटियों के जन्म दिन को खास अंदाज में मनाते हैं। उनके द्वारा शादी के दिन पौध रोपण का संकल्प आज बेटियों के जन्म का हरित उत्सव बन चुका है। यह केवल पारिवारिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा बल्कि भावनात्मक संदेश बन गया। बेटियों को बड़ा करने के साथ-साथ पौधों को भी बड़ा करने की कसमें खाईं। यही भावना आगे चलकर समाज की सोच बनी। आज इस मुहिम के तहत 500 से भी अधिक पौधे रोपे जा चुके हैं। राष्टÑीय बालिका दिवस पर यह कहानी बताती है कि बेटी का स्वागत अगर हरियाली से हो तो भविष्य और भी सुरक्षित हो सकता है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर जब देशभर में बेटियों के अधिकार, सम्मान और सुरक्षित भविष्य की बात होती है, तब सतना के माता लक्ष्मी रैकवार और पिता राकेश रैकवार का परिवार एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आता है। इस परिवार ने वर्षों पहले यह तय कर लिया था कि बेटी का स्वागत केवल मिठाइयों और शुभकामनाओं से नहीं, बल्कि धरती को हरियाली सौंपकर किया जाएगा। यही सोच आज एक सामाजिक अभियान का रूप ले चुकी है।
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यादें बन गई मुहिम
5 जून 1997 को विवाह के दिन राकेश रैकवार और लक्ष्मी रैकवार ने पौधरोपण का संकल्प लिया। यह संकल्प उस दौर में लिया गया, जब ऐसे प्रयास समाज में आम नहीं थे। 8 अगस्त 1999 को जब उनकी सबसे बड़ी बेटी कृपाली रैकवार का जन्म हुआ, तब इस संकल्प को नई दिशा मिली। बेटी के जन्मदिन पर पौधा रोपकर यह संदेश दिया गया कि बेटी और पेड़ दोनों को सहेजना और बड़ा करना समाज की जिम्मेदारी है। आज कृपाली आयुर्वेद से चिकित्सक बनकर जबलपुर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत हैं, जो इस संस्कार का सशक्त परिणाम है।
15 साल पहले शुरूआत
इसके बाद चैत्या और फिर अंशली का जन्म हुआ। हर बेटी के साथ यह मुहिम और मजबूत होती गई। परिवार ने बेटियों को बचाने और पढ़ाने के संदेश को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यवहार में उतार दिया। करीब 15 साल पहले सोहौला में पहला पौधा रोपा गया, जो इस अभियान की नींव बना। इसके बाद खनगढ़, प्राथमिक शाला जवाहर नगर, माध्यमिक शाला खूंथी, कन्या शाला धवारी, कामता टोला, माध्यमिक शाला महादेवा, सरस्वती स्कूल महादेवा, कलेक्ट्रेट परिसर और नवीन तहसील भवन जैसे सार्वजनिक स्थलों पर पौधरोपण किया गया। अब तक 500 से अधिक पौधे रोपे जा चुके हैं, जिनमें से कई आज समाज को छांव और आॅक्सीजन दे रहे हैं। वर्ष 2013 से हिंदू पर्व समन्वय समिति भी इस मुहिम से जुड़ गई। इसके बाद पर्वों और सामाजिक आयोजनों में पौधरोपण को परंपरा बना दिया गया।
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