नोएडा के सेक्टर 150 में कार समेत नाले में गिरे युवराज मेहता की मौत ने सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। पढ़िए कैसे फायर ब्रिगेड की लापरवाही और एक डिलिवरी बॉय की बहादुरी के बीच एक पिता ने अपना बेटा खो दिया।
By: Star News
Jan 19, 20264:28 PM
नई दिल्ली. स्टार समाचार वेब
रात के करीब 12 बज रहे थे, जब राजकुमार मेहता के फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ उनका 27 वर्षीय बेटा युवराज मेहता था, जो मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहा था। नोएडा के सेक्टर 150 में एक निर्माणाधीन मॉल के पानी से भरे बेसमेंट में उसकी कार गिर चुकी थी। "पापा मुझे बचा लो", बेटे की यह पुकार सुन पिता जिस हाल में थे, उसी हाल में सड़क पर दौड़ पड़े। एक अनजान कैब वाले की मदद से वे भटकते हुए आखिरकार उस जगह पहुंचे, जहां युवराज कार की छत पर लेटा 'हेल्प-हेल्प' चिल्ला रहा था। पिता की आंखों के सामने उनका इकलौता जवान बेटा था, जो महज कुछ मीटर की दूरी पर था, लेकिन बीच में मौत जैसा गहरा और ठंडा पानी था।

सूचना मिलने पर पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन यहीं से सिस्टम की पोल खुलनी शुरू हुई। युवराज अपनी कार की छत पर मोबाइल की टॉर्च जलाकर करीब पौने दो घंटे तक मदद का इंतजार करता रहा। फायर ब्रिगेड के पास हाइड्रोलिक मशीन थी, लेकिन उसे चलाने के लिए कोई प्रशिक्षित ऑपरेटर नहीं था। रस्सी फेंकने की कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि दूरी और तकनीक का तालमेल नहीं था। रेस्क्यू टीम के पास न तो नाव थी और न ही पानी में उतरने का साहस। पिता लाचार खड़े देखते रहे और करीब ढाई बजे मोबाइल की वह रोशनी हमेशा के लिए बुझ गई, जो युवराज की मौजूदगी का आखिरी सबूत थी।
जब सिस्टम के नुमाइंदे 'पानी ठंडा है' और 'अंदर सरिया है' जैसे बहाने बनाकर किनारे बैठे थे, तब एक साधारण डिलिवरी बॉय मोहिंदर वहां पहुंचा। मोहिंदर ने वह साहस दिखाया जो वर्दीधारियों में नदारद था। उसने सरकारी अमले की कायरता को चुनौती देते हुए अपने कपड़े उतारे, कमर पर रस्सा बांधा और उस बर्फीले पानी में कूद गया। मोहिंदर करीब 30 मिनट तक पानी के अंदर युवराज और उसकी कार को तलाशता रहा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। युवराज पानी की गहराई में कहीं खो चुका था। जो काम संसाधनों से लैस विभाग को करना था, वह एक निस्वार्थ नागरिक ने किया, लेकिन सिस्टम की 10 मिनट की देरी ने एक जान ले ली।
इस पूरी घटना ने नोएडा प्रशासन और रेस्क्यू टीमों की ट्रेनिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसडीआरएफ और फायर ब्रिगेड की मौजूदगी के बावजूद एक युवक पौने दो घंटे तक मदद मांगता रहा और डूब गया। क्या हमारी सुरक्षा टीमें केवल कागजों पर चुस्त हैं? जब एक आम नागरिक जान जोखिम में डालकर पानी में उतर सकता है, तो प्रशिक्षित जवान 'ठंडे पानी' का बहाना कैसे बना सकते हैं? युवराज मेहता की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सरकारी महकमे की उस कार्यप्रणाली की हार है, जिसने एक पिता की गोद सूनी कर दी।