सतना जिला अस्पताल में मरीजों की स्थिति बदहाल है। टूटी व्हीलचेयर, बिना टायर के स्ट्रेचर और अव्यवस्थित प्रबंधन के कारण मरीजों और परिजनों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। 16 व्हीलचेयर और 24 स्ट्रेचर के दावों के बावजूद अस्पताल में ठीक हालत का एक भी साधन उपलब्ध नहीं मिला। मरम्मत के नाम पर पुराने उपकरण वेल्डिंग होते नजर आए।

प्रमुख बिंदु:
सतना, स्टार समाचार वेब
जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाएं दिनबदिन दम तोड़ते नजर आ रही हैं। आलम यह है कि जिला अस्पताल में भर्ती के लिए आने और भर्ती के बाद डिस्चार्ज मरीजों को टूटी व्हीलचेयर और टूटे स्ट्रेचर का सहारा लेना पड़ रहा है। कभी कभार तो कुछ मरीजों को कंधे के सहारे टांग कर लाया गया है, वहीं कुछ मामलों में परिजनों को व्हील चेयर तो मिलती है पर वो भी टूटी रहती है, जहां इन टूटी व्हीलचेयरों को परिजनों द्वारा गमझे से खींचने की स्थित स्थिति निर्मित हो रही है।
शनिवार को भी जिला अस्पताल में ऐसे ही नजारे देखने को मिला जहां मरीज टूटी व्हीलचेयर में बैठा था और परिजन व्हीलचेयर को गमझा बांध के खींचते नजर आए। इसके अलावा एक अन्य मरीज भी बिना टायर वाली व्हीलचेयर से जांच के लिए जाता हुआ नजर आया।
बताया गया कि जिला अस्पताल में कागजों पर तो सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन धरातल से ये नदारद हैं। आमजन को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए सरकार लाखों रुपये का बजट हर वर्ष खर्च करती है, उसके बावजूद सुविधा नहीं मिल पा रही है। जानकारी के मुताबिक जिला अस्पताल में औसतन 1500 से अधिक मरीज रोजाना इलाज कराने आते हैं। इन मरीजों की सुविधाओं के लिए 16 व्हीलचेयर, 24 स्ट्रेचर की उपलब्धता का अस्पताल प्रशासन द्वारा दावा किया जाता है लेकिन मौके पर मरीजों को टूटे व्हीलचेयर और स्ट्रेचर के भरोसे रहना पड़ता है।
ऐसे मिले हालात
जिला अस्पताल में ठंड के चलते भले ही मरीजों की संख्या घटी है लेकिन अभी भी औसतन 1200 के ऊपर मरीज पहुंच रहे हैं। जिला अस्पताल में स्टेÑचर व व्हीलचेयर न मिलना और टूटी-फूटी मिलना यह कोई नई समस्या नहीं है। प्रबंधन भले ही लाख दावे करे कि जिला अस्पताल में 16 व्हीलचेयर एवं 24 स्टेÑचर हैं, जबकि मौके पर मरीजों को एक भी सही हालत में उपलब्ध नहीं होती है। शनिवार को सर्जिकल वार्ड क्रमांक-2 से डिस्चार्ज हुए मरीज समयलाल पिता रामभजन उम्र 22 साल निवासी-करौंदी टूटी व्हीलचेयर में बैठे नजर आए। इस टूटी व्हीलचेयर को आगे खीचने के लिए गमछे का सहारा लेना पड़ा। व्हीलचेयर का आगे का एक टायर गायब था, जबकि आगे का ही दूसरा टायर बैण्ड था, जिस कारण व्हीलचेयर आगे बढ़ ही नहीं रही थी। आगे बढ़ाने के लिए परिजन गमछे से व्हीलचेयर खीचते नजर आए। वहीं एक अन्य मामला टूटी व्हीलचेयर का देखने को मिला, जिसमें बैठाकर मरीज को नैदानिक केन्द्र में जांच के लिए परिजनों द्वारा ले जाया जा रहा था। इस व्हीलचेयर की स्थिति भी खराब थी। इसका भी आगे का टायर गायब था और दूसरा टायर मुड़ा हुआ था।
पुराने स्ट्रेचरों की रिपेयरिंग शुरू
इमरजेंसी के बाहर रखे अधिकतर स्ट्रेचर खराब पड़े हुए हैं। टूटे हुए स्टेÑचरों में रिपेयरिंग का काम शुरू किया गया है। शनिवार को रिपेयरिंग कर्मी स्टेÑचरों के पायदान पर वेल्डिंग करते नजर आए। प्रबंधन द्वारा हर बार का यही नियम है कि पुराने को रिपेयरिंग करवाओ और नए को दबाकर रखे रहो। नए व्हीलचेयर एवं स्टेÑचर तभी निकाले जाते हैं जब जिला अस्पताल के निरीक्षण में कोई अधिकारी पहुंचता है।
आर्थो-इमर्जेन्सी वार्ड में सर्वाधिक समस्या
जिला अस्पताल में सबसे ज्यादा समस्याएं आर्थों वार्ड के मरीजों को देखने को मिलती हैं। इस वार्ड के अधिकांश मामलों में मरीजों के हाथ या पैर फ्रैक्चर रहते हैं, जिन्हें प्लास्टर कर कुछ दिन वार्ड में भर्ती रखा जाता है, इसके बाद डिस्चार्ज किया जाता है। ऐसे मरीजों को डिस्चार्ज के बाद सुरक्षित घर ले जाने में सबसे ज्यादा समस्या आती है। कई मामलों में व्हीलचेयर को कपड़े से बांधकर आगे से उठाना भी पड़ता है। इसके अलावा एमर्जेन्सी वार्ड के बाहर टूटे हुए स्ट्रेचरों का भंडार पड़ा हुआ है। एमर्जेन्सी में आने वाले मरीजों को कभी भी समय पर अच्छी हालत का स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं होता। परिजनों को मरीजों को एमर्जेन्सी वार्ड तक लेजाने के लिए टूटे स्ट्रेचरों का सहारा लेना पड़ता है।
जिला अस्पताल में स्टेÑचर एवं व्हीलचेयर की कोई कमी नहीं है। हर वार्ड में एक स्ट्रेचर एवं व्हीलचेयर रखवाए गए हैं। यह समस्या तब खड़ी होती है जब लोड अधिक होता है और परिजन सहयोग नहीं करते हैं। मरीज के परिजन मरीज को ले जाने के बाद अन्यत्र जगह छोड़कर चले जाते हैं, जिन्हें बाद में वार्ड में भिजवाना पड़ता है।
डॉ. शरद दुबे, आरएमओ जिला अस्पताल


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