सतना जिले में कुपोषण गंभीर चुनौती बना हुआ है। 1357 बच्चे अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में हैं, लेकिन पोषण पुनर्वास केंद्रों में बेड खाली पड़े हैं। विभागीय समन्वय की कमी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
कुपोषण से निपटने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, पर इन प्रयासों का लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। हालात यह हैं कि जिले में 1357 बच्चे अति गंंभीर कुपोषण के श्रेणी में हैं, यह आंकड़ा राष्टÑीय स्वास्थ्य मिशन का है। सबसे दुर्भाग्य पूर्ण पहलू तो यह है कि इस सबके बावजूद पोषण पुर्नवास केन्द्र (एनआरसी) खाली पड़े हैं। कुपोषण की सबसे भयावह स्थिति चित्रकूट क्षेत्र की है, यहां 363 बच्चे अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं तो उचेहरा में 211 जबकि सतना शहर में 122 बच्चे अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में हैं। शहरी क्षेत्र में इतनी बड़ी तादात में अति गंभीर कुपोषित बच्चों को पाया जाना अपने आप में कुपोषण से निपटने के किए जा रहे तमाम प्रयासों पर सवाल खड़ा कर रहा है।
जिले में दिन-ब-दिन कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा देखने को मिल रहा है। इसका सबसे दुर्भाग्य पूर्ण पहलू यह है कि साल खत्म हो गया लेकिन अभी तक जिले के चिन्हित कुपोषित बच्चों को एनआरसी केंद्रों में पहुंचाने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया है। महिला बाल विकास एवं स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले की लापरवाही के चलते गंभीर कुपोषित बच्चे पोषण पुनर्वास केंद्र तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा जिले में 1357 बच्चों को अति गंभीर कुपोषित श्रेणी (सैम) में चिन्हित किया गया है, जिनके देखभाल के लिए स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों को कई निर्देश दिए गए हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इतनी बड़ी संख्या में कुपोषित बच्चे चिन्हित करने के बाद भी जिले की कई एनआरसी में बेड खाली पड़े हुए हैं। जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र में वर्तमान में 20 बेड में केवल 5 बच्चे ही भर्ती हैं। सूत्रों ने बताया कि यह कोई नई स्थिति नहीं है जब ऐसा हुआ हो अधिकांश समय जिला अस्पताल की सबसे बड़ी एनआरसी में बेड खाली ही मिलते हैं।
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स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास विभाग में समन्वय नहीं
कुपोषित बच्चों की खोज कर उन्हें पुर्नवास केन्द्र तक लाने की संयुक्त जिम्मेदारी स्वास्थ्य व महिला बाल विकास विभाग की है लेकिन पुर्नवास केन्द्रों तक पहुंचे बच्चों के आंकड़े बता रहे हैं कि दोनों विभागों में समन्वय नहीं है। एनआरसी में भर्ती किए हुए बच्चे ज्यादातर पीडियाट्रिक आईसीयू, बच्चा वार्ड और ओपीडी से भेजे गए हैं। पीडियाट्रिक आईसीयू से एक सैकड़ा बच्चे इलाज के बाद भर्ती कराए गए। ओपीडी से 80 कुपोषितों को चिन्हित कर एनआरसी भेजा गया। वहीं केवल एक दर्जन केस ही आशा कार्यकर्ताओं ने खोजा। इस प्रकार स्वास्थ्य विभाग अपने हिसाब से कुपोषित बच्चे चिन्हित कर एनआरसी में भर्ती करा रहा है लेकिन महिला बाल विकास विभाग द्वारा अभियान में तेजी नहीं लाई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2025 में महिला बाल विकास विभाग द्वारा एक सैकड़ा के आसपास बच्चे ही एनआरसी में भेजे गए हैं। इससे साफ हो रहा है कि स्वास्थ्य विभाग एवं महिला बाल विकास विभाग के बीच आपसी समन्वय नहीं स्थापित है।
फील्ड वर्कर करेंगे निगरानी
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से मिले निदेर्शों के बाद सीएमएचओ डॉ. मनोज शुक्ला द्वारा जिले के सभी बीएमओ, बीपीएम, बीसीएम एवं प्रभारी बीसीएम को ब्लॉक वाइज कुपोषित बच्चों की सूची भेजकर उनके देखभाल करने के निर्देश दिए गए हैं। इन बच्चों के स्वास्थ्य की निगरानी करने के लिए सभी स्वास्थ्य संस्थाओं के सीएचओ, एएनएम, आशा सुपरवाइजर एवं आशा कार्यकर्ता को जिम्मेदारी सौंपी गई है। बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान यदि कुपोषित बच्चों में गंभीर लक्षण दिखाई दें तो उन्हें नजदीकी स्वास्थ्य संस्थाओं में भेजकर उपचार कराने या हायर सेंटर में रेफर के भी निर्देश जारी किए गए हैं।
शहर में 122 बच्चे अति गंभीर कुपोषित
कुपोषण के लिए चित्रकूट का क्षेत्र खासकर मझगवां का इलाका हमेशा से बदनाम रहा है। कुपोषण का कलंक यहां समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। पर अब इसका असर शहरी क्षेत्र में भी तेजी के साथ देखने को मिलने लगा है। कुपोषण से जुड़े हालिया जो आंकड़े सामने आए हैं वे काफी भयावह हैं, ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो छोड़िए अकेले शहर में ही 122 बच्चे अति गंभीर कुपोषित श्रेणी में पाए गए हैं। इन्हीं आंकड़ों पर गौर करें तो पहाड़ी अंचल में कुपोषण की स्थिति तो दिन-ब-दिन बदत्तर होती जा रही है। आंकड़ों के मुताबिक पहाड़ी अंचलों से अभी भी कुपोषण का साया खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। चित्रकूट अंचल में 363 बच्चे अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं। उसके बाद उचेहरा में 211 बच्चे चिन्हित किए गए हैं।
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जिला अस्पताल में एनआरसी के 20 बेड, मात्र पांच बच्चे भर्ती
शहरी क्षेत्र में 122 अति गंभीर कुपोषित बच्चे सामने आए हैं, लेकिन इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि इतनी बड़ी तादात में कुपोषित बच्चे चिन्हित किए जाने के बावजूद उन्हें पोषण पुर्नवास केन्द्र तक लाने के सार्थक पहल नहीं की गई तभी तो 20 बिस्तरों वाले जिला अस्पताल की एनआरसी में मौजूदा समय में मात्र पांच बच्चे ही भर्ती हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिले में जिला अस्पताल सहित आठों विकासखंड में पोषण पुनर्वास केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों में भर्ती बच्चों को समय पर आहार के साथ दवाइयां और फॉलोअप भी किया जाता है। बच्चे में सुधार के बाद यहां से डिस्चार्ज किया जाता है। सरकार की योजनाओं को किस तरह स्वास्थ्य विभाग पलीता लगा रहा है यह सतना के पोषण पुनर्वास केंद्र को देखकर लगाया जा सकता है। यह बातें जिला अस्पताल प्रबंधन की रिपोर्ट से ही उजागर हुई हैं। मिली जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल के पोषण पुर्नवास केन्द्र में 31 दिसम्बर 2025 को 20 बेड की एनआरसी में केवल पांच बच्चे भर्ती रहे। इन्हीं आंकड़ों की बात करें तो जनवरी 2025 से दिसम्बर 2025 तक कुल 323 कुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल की एनआरसी में भर्ती किया गया है। जबकि दिसम्बर माह में कुल 17 बच्चे ही भर्ती हुए।
कुपोषित बच्चों की पहचान के लिए तीन क्राइटेरिया तय किए गए हैं, जिसमें वजन, लम्बाई और पैरों में सूजन की जांच की जाती है। सबसे पहले बच्चों की उम्र के अनुसार लम्बाई और वजन मापा जाता है। इसके बाद भुजाओं की माप की जाती है। बच्चों की लम्बाई व वजन मापने के बाद चार्ट के अनुसार यह तय किया जाता है कि बच्चा कुपोषण की श्रेणी में है या नहीं। अंत में बच्चे के पैरों की सूजन की जांच की जाती है। बच्चों के दोनों पैरों में सूजन मिलने पर बच्चोंको अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में रखकर पोषण पुनर्वास केन्द्र में भर्ती कर इलाज किया जाता है।
डॉ. संदीप द्विवेदी, जिला अस्पताल के एनआरसी प्रभारी
रिपोर्ट: बृजेश पाण्डेय


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