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राजनीति में जुबान का फिसलना कई बार साजिश माना जाता है, लेकिन कभी-कभी यह मासूम सच बोल देता है। हाल ही में हुए पार्टी के नए मुखिया के स्वागत समारोह में ऐसा ही एक “जुबानी हादसा” हो गया और अब उसका पोस्टमार्टम पूरे राजनीतिक गलियारों में हो रहा है। सालों से सरकार की जितनी भी दमदार योजनाएं रहीं। सीएम राइज स्कूल, लाडली बहना योजना, डिजिटल गांव, स्मार्ट एजुकेशन। सबके पीछे एक ही छवि खड़ी की जाती रही, माननीय की अद्वितीय सोच और विजन। मंचों से लेकर मीडिया तक, यही बताया गया कि ये सारी योजनाएं ‘वो’ खुद सोचते हैं, खुद गढ़ते हैं, और जनता को सौंप देते हैं। लेकिन... इस बार कुछ अलग हुआ। पार्टी के नए मुखिया के स्वागत कार्यक्रम में माननीय ने माइक थामा और बोल पड़े कि “सीएम राइज स्कूल की परिकल्पना तो हमारे नए अध्यक्ष जी की थी।” बस, इतना ही काफी था। फिर क्या था! पुराने एंटिना एक्टिव हो गए। अब हर कोई पूछ रहा है “तो बाकी योजनाएं किसके दिमाग की उपज थीं? और किसके दिमाग को 'साइलेंसर' पहनाकर क्रेडिट खुद ले लिया गया?” चुटकी लेने वाले पूछ रहे हैं कि लाडली बहना योजना किस थिंक टैंक से निकली थी?” सरकार के ब्रेन स्टॉर्मिंग सत्रों में असली 'ब्रेन' किसका था? दरअसल, समस्या ‘सच्चाई’ की नहीं, ‘क्रेडिट’ की है। सत्ता में बैठे चेहरे कई बार ‘सार्वजनिक धन्यवाद’ देना भूल जाते हैं और जब गलती से जुबान सच बोल दे, तो वही सच्चाई तीर बनकर वापस लौटती है।

राजनीति और नौकरशाही की दुनिया में कुछ बातें साफ़ नहीं लिखी जातीं, बस ‘कोड’ में कह दी जाती हैं। जैसे पुलिस वालों को कभी-कभी माइक 1 और माइक 2 कहा जाता है। अब अगर यही “1” और “2” को “टी 1” और “टी 2” बोला जाए, तो प्रशासनिक गलियारे में सन्नाटा पसर जाता है और अफसरशाही की रूह तक काँप उठती है। दरअसल, “टी” का मतलब है टारगेट और आजकल टी 1 की हालत देखकर बाकी सब टी बनने से डर रहे हैं। कहा जा रहा है कि टी 1 वही हैं, जो चुनाव पूर्व तक प्रशासन के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान थे। लंबी चौड़ी पकड़, सधे हुए बोल, और “अपराजेय” छवि वाले साहब… लेकिन सत्ता का नेतृत्व बदलते ही उन पर और उनके करीबियों पर जाँच एजेंसियों ने नजरें टेढ़ी कर लीं। अब साहब खुद भी जांच की गर्मी से हलकान हैं और बेचारे चाय की जगह नींबू पानी से दिन काट रहे हैं। पर, बड़ा सवाल यह है कि टी 2 कौन? तो अय्यारों की माने तो अगला नंबर उस "स्वास्थ्य सेवक" का हो सकता है, जो खुद को जनता और सरकार दोनों का तारणहार समझते थे। लंबे समय तक स्वास्थ्य महकमे के शीर्ष पर रहे, पर जब खुद की कुर्सी खतरे में दिखी और ऊपर की लिफ्ट बंद होती नजर आई तो चुपचाप सेवा से रुख़्सत होकर निकल लिए। कहा जा रहा है कि उनकी फाइलें मोटी हैं, किस्से अनगिनत, और पुराने साहबों के तो "विशेष कृपापात्र" भी रहे। इतना ही नहीं, "बड़ी दवाई, बड़ा खेल, और बड़ी लॉबी" सब में उनका नाम अक्सर गूंजा करता था, मगर सबूतों की कमी और 'ऊपर' की छाया ने उन्हें बचाए रखा। कुछ शातिर तो यह भी जोड़ रहे हैं कि “टी 3 और टी 4 की फेहरिस्त भी बन चुकी है, बस मौसम अनुकूल होने का इंतज़ार है।”

गर्मी में प्यास बुझाना पुण्य का काम माना जाता है। लेकिन राजधानी के वीआईपी इलाकों में अब पानी पिलाना भी "इमेज बिल्डिंग टूल" बन गया है। पुण्य तो किया गया, लेकिन बिना प्रचार के नहीं। 74 बंगले के एक माननीय ने ऐसा ही किया। अपने सरकारी आवास के बाहर प्याऊ लगवाया, लेकिन उससे भी ज़्यादा ध्यान खींचा ऊपर चमकते फ्लैक्स ने। प्याऊ से पहले लोगों की नज़र बैनर पर गई। अब कुछ पुराने सयाने कह रहे हैं — "प्याऊ तो पुण्य का काम है, पर यहां तो पुण्य भी पब्लिसिटी प्लान के साथ पैक किया गया लगता है। वैसे चार इमली का माजरा अलग था, यहां भी चुनिंदा आला अफसर और नेताओं ने अपने घरों के सामने चुपचाप प्याऊ रखवाए। पर यहां न कोई पोस्टर लगा था और न ही कोई बैनर। यहां था तो बस, जरूरतमंद को ठंडा पानी। अब दोनों जगह माधा टेकने वाले अंतर देख फुसफुसा रहे हैं कि “प्याऊ से प्यास नहीं, प्रोफाइल उठाई जा रही है।” और कुछ तंज कस रहे हैं “अब तो लगता है अगली बार मटकों पर भी माननीय की फोटो और QR कोड चिपकवा देंगे स्कैन करो और पानी पियो!” । चलते चलते बता दें ये वही माननीय हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में भी जलसेवा का शुभारंभ एक झंके मंके से किया था। वहां भी मटका भरने से पहले कैमरे से सोशल मीडिया भर गया था।

एक समय में सत्ता के गलियारों में ठाकुर के हाथ बंधे हैं डायलॉग बड़े चाव से बोला जाता था। किसने बाँधे थे ये हाथ — ये बात सब जानते थे, पर कोई खुलकर कहता नहीं था। अब वही हाथ बाँधने वाला अचानक सत्ता नेतृत्व से बाहर बैठा मिला तो उसे अपना पुराना सखा याद आ गया। ऐसे में सखा का कंधा काम आता है यही सोचकर पुराने साथी से मिलने पहुँच गए। दोनों का आपसी ‘भरत मिलाप’ हुआ, पर मजा तब किरकिरा हो गया जब उसी वक्त एक काबीना महिला मंत्री भी वहाँ पहुँच गईं। मंत्री जी के इंतजार की खबर बाहर निकली तो उस पर सियासी नींबू निचुड़ गया। खबर महिला मंत्री के इंतजार की बनी और सखा से मिलाप आधा सुनाई दिया, आधा दब गया अब चर्चा ये है कि यह संयोग दुर्योग क्यों बना? कहने वाले कह रहे हैं कि कहीं कोई नया समीकरण तो नहीं पनप रहा।

राजधानी में बने एक 90 डिग्री के ओवर ब्रिज ने न केवल इंजीनियरिंग मानकों की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि राज्य की साख को भी राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाया। इस अजीबोगरीब डिज़ाइन की चर्चा इतनी तेज हुई कि यह मामला प्रदेश की छवि पर इतना भारी पड़ा कि मुख्यमंत्री को स्वयं इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। मुख्यमंत्री ने न सिर्फ संज्ञान लिया बल्कि निर्माण एजेंसी और संबंधित इंजीनियरों पर अब तक की सबसे बड़ी कार्यवाही करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह कदम आमजन में सराहा गया, जिससे सरकार की तत्परता और संवेदनशीलता की छवि मजबूत हुई। लेकिन इस पूरे मामले में अब जो सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है, वह विभागीय मंत्री की भूमिका को लेकर है। दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचने के बाद मंत्री जी ने मामले की जांच के आदेश दिए थे और रिपोर्ट भी मंगाई थी। लेकिन रिपोर्ट आने के बाद किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। अब सत्ता के गलियारों में चर्चा इस बात की है कि जब मंत्री को जानकारी थी, जब रिपोर्ट भी उनके पास पहुंच गई थी तो एक्शन क्यों नहीं लिया गया? क्या रिपोर्ट में गड़बड़ी नहीं पाई गई थी या फिर कोई अन्य कारण था जिसकी वजह से फाइल दबा दी गई? मंत्री जी की "संतुष्टि" का कोण अब गणितज्ञ भी नहीं निकाल पा रहे। मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए त्वरित फैसले के बाद यह चुप्पी और भी अधिक संदिग्ध लग रही है।

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