हाल ही में उमरिया के घुनघुटी वनक्षेत्र के गांवों में जंगली हाथियों का समूह घुस गया। हाथियों ने 4-5 दिनों तक भारी आतंक मचाया। कई मकानों को क्षतिग्रस्त किया और फसलों को भी नुकसान पहुंचाया। मानव और हाथियों का यह संघर्ष नया नहीं है।

भोपाल. मीतेन्द्र नागेश स्टार समाचार वेब
हाल ही में उमरिया के घुनघुटी वनक्षेत्र के गांवों में जंगली हाथियों का समूह घुस गया। हाथियों ने 4-5 दिनों तक भारी आतंक मचाया। कई मकानों को क्षतिग्रस्त किया और फसलों को भी नुकसान पहुंचाया। मानव और हाथियों का यह संघर्ष नया नहीं है। हर साल दोनों आमने-सामने होते हैं। मानव बस्तियों और खेतों में तबाही होती है। कई बार तो हाथियों को भी नुकसान पहुंचता है। हजारों सालों से हाथी और मानव सह-अस्तित्व में रहते आए हैं, फिर आखिर क्या वजह है कि हाथी इतने हिंसक हो जाते हैं और संघर्ष की स्थिति निर्मित होती है।
मानव बस्तियों का रुख क्यों?
हाथी शाकाहारी प्राणी है। 150 किग्रा तक वनस्पति और 190 लीटर तक पानी उनकी प्रतिदिन की खुराक होती है। जंगल में पर्याप्त भोजन और पानी की तलाश उनसे लंबी यात्राएं करवाते हैं। इंसान अपनी विभिन्न जरूरतों के लिए जंगलों की ओर रुख कर रहा है। अनजाने में ही सही यह वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर अतिक्रमण है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण भी हाथियों के लिए भोजन और पानी की उपलब्धता का क्षेत्र सीमित होता जा रहा है। अपनी इन्हीं जरूरतों को पूरा करने की अपनी यात्राओं के दौरान अक्सर हाथी मानव बस्तियों की ओर रुख करते हैं।
जंगल से लगे हुए क्षेत्र में लोग भूमि, भोजन, पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सीमित कर रहे हैं। अपने आवास के दायरे में खेत, मानव बस्तियां, सड़कें और विकास के अन्य निर्माण से हाथियों को आशंकित किया है। इनके आवास और मानव बस्तियों की दूरी कम हुई है। कई बार अपने क्षेत्र में इंसानों की घुसपैठ से खतरा महसूस होने के कारण हाथी हिंसक हो जाते हैं। वहीं मानव बस्तियों में घुसने के बाद इंसानों द्वारा खतरा महसूस होने और फसलों को नुकसान पहुंचाने पर हाथियों के प्रति जो प्रतिक्रिया की जाती है, उससे भी हाथी के स्वभाव में आक्रमकता आती है। इन दोनों स्थिति में मानवऔर हाथी एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और उनके बीच संघर्ष की स्थिति बनती है।
हाल ही में उमरिया जिले में अनूपपुर जिले से जंगली हाथियों का झुंड घुस गया। हाथियों ने गांव में ग्रामीणों के घरों और फसलों को तबाह कर दिया। हाथी खेतों में घुसकर फसलों को बरबाद करते हैं। वहीं बस्ती में हाथी उन घरों पर हमला करते हैं, जिनमें फसलें या महुआ रखे होती हैं। वन अधिकारियों के अनुसार मानव-हाथी संघर्ष में ज्यादातर मौतें तब होती हैं, जब लोग या तो हाथियों के रास्ते में आ जाते हैं या जब मनुष्य हाथियों से अपनी फसलों और घरों की रक्षा करने की कोशिश करते हैं।
मानव बस्तियों और खेतों में हाथियों के घुस आने से कई बार उनकी जान पर भी बन आती है। करीब नौ महीने पहले बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में कथित तौर पर फंगस-संक्रमित कोदो की फसलों को खाने के बाद 11 हाथियों की मौत हो गई थी। इधर, पिछले साल नवंबर में शहडोल से सतना की ओर तीन हाथियों का झुंड आया था। यह पहली बार था जब यहां के ग्रामीणों को हाथियों सामना करना पड़ा। उन्होंने हाथियों को भगाने की कोशिश की। इससे अफरा-तफरी मच गई। इसी बीच झुंड का एक हाथी जमीन से करीब तीन मीटर ऊपर लटकी 11 सौ किलोवाट की बिजली लाइन के संपर्क में आ गया और करंट लगने उसकी मौत हो गई।
मध्य प्रदेश कैबिनेट ने इसी साल मई में मानव-हाथी संघर्ष की समस्या को देखते हुए 47 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य जनहानि, संपत्ति नुकसान और हाथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस योजना में रेडियो बुलेटिन, व्हाट्सएप अलर्ट और हाथियों की गतिविधियों के बारे में ग्रामीणों को सूचित करने के लिए नियंत्रण कक्ष शामिल हैं। हाथी मित्र दल का गठन कर ग्रामीणों और वन विभाग सहित अन्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जायेगा। हाथी-मानव संघर्ष से निपटने के लिए इस योजना में अन्य उपाय भी शामिल किये गये हैं।

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