छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में 30 बच्चों की मौत के बाद हाईकोर्ट ने डॉ. प्रवीण सोनी की जमानत अर्जी खारिज की। जानिए कैसे कमीशन के चक्कर में मासूमों को दिया गया जहर।

जबलपुर/छिंदवाड़ा। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित 'छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड' में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। 30 मासूम बच्चों की मौत के जिम्मेदार माने जा रहे मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी ज्योति सोनी और दो अन्य की जमानत याचिकाओं को न्यायालय ने सिरे से खारिज कर दिया है।
जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि ऐसे गंभीर अपराधों में आरोपियों को राहत दी गई, तो आम जनता का न्याय प्रणाली से विश्वास उठ जाएगा। अदालत ने कहा, यह मामला केवल एक चिकित्सीय लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ जानबूझकर किया गया खिलवाड़ है। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सितंबर 2025 में ही नागपुर के वरिष्ठ डॉक्टर प्रवीण खापेकर ने डॉ. सोनी को बुलाकर आगाह किया था। उन्होंने बताया था कि भर्ती बच्चों के लक्षण 1998 के दिल्ली कांड (DEG टॉक्सिसिटी) जैसे हैं। इस गंभीर चेतावनी के बावजूद, डॉ. सोनी कमीशन के लालच में वही दूषित सिरप बच्चों को प्रिस्क्राइब करते रहे।
मानक से 460 गुना ज्यादा घातक जहर
सरकारी लैब और ड्रग विभाग की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) पाया गया, जो एक घातक नेफ्रोटॉक्सिक (किडनी खराब करने वाला जहर) है। रिपोर्ट के अनुसार सिरप में इसकी मात्रा 46.28% थी, जबकि सुरक्षित सीमा मात्र 0.1% है। इस जहरीले मिश्रण के कारण बच्चों की किडनी फेल हो गई और 30 मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
नियमों और प्रतिबंधों का उल्लंघन
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) ने 18 दिसंबर 2023 को ही एक सर्कुलर जारी कर 4 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए 'फिक्स्ड डोज कंपाउंड' (FDC) सिरप प्रतिबंधित कर दिया था। डॉ. सोनी ने इस नियम को ताक पर रखकर ढाई-तीन साल के बच्चों को यह सिरप दिया।
कमीशन और सबूतों को मिटाने का खेल
कोर्ट में पेश दस्तावेजों के अनुसार डॉक्टर को हर बोतल लिखने पर 10% कमीशन मिलता था। मेडिकल स्टोर संचालक को प्रति बोतल 23 रुपये का मुनाफा होता था। जब मौतों का सिलसिला शुरू हुआ, तो आरोपियों ने मिलकर मेडिकल रिकॉर्ड और सिरप की बोतलों जैसे अहम सबूत नष्ट करने की कोशिश की।
बचाव पक्ष की दलीलें खारिज हुईं
डॉ. प्रवीण सोनी के वकील ने तर्क दिया कि वे पिछले 20 साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं और दवा बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि दवा पर आधिकारिक रोक 4 अक्टूबर 2025 को लगी, जबकि वे उससे पहले से दवा लिख रहे थे। हालांकि, कोर्ट ने 'जानबूझकर दी गई लापरवाही' और 'चेतावनी की अनदेखी' को आधार मानते हुए इन तर्कों को अमान्य कर दिया।
बता दे पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या), 276 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।

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