धीरेन्द्र सिंह राठौर का ब्लॉग

उम्मीदों के बोझ तले 'बड़के साहब'
जिले के बड़के साहब इन दिनों खासे परेशान हैं, इनकी परेशानी का कारण और कोई नहीं बल्कि इनके मातहत स्वयं हैं। व्यवस्था में सुधार लाने की बड़ी उम्मीदों के साथ सतना आए साहब से लोगों को भी बड़ी उम्मीदें थीं, अब इन्हीं उम्मीदों के बोझ तले ‘साहब’ दब से गए हैं। साहब करना तो बहुत कुछ चाह रहे हैं, पर वर्तमान सिस्टम उन्हें कुछ नहीं दे रहा। साहब सिस्टम में सुधार लाने और व्यवस्था दुरुस्त करने आदेश- निर्देश भी खूब दे रहे हैं, पर जिन्हें इन आदेशों - निर्देशों को जमीन पर ले जाना है,उनके कांनों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। यह अलग बात है कि अपने निर्देशों की अवहेलना देख साहब नोटिस और वेतन काटने के अपने हथियार भी खूब चलाते हैं, पर वर्षों से व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे अधिकारियों ने अपना एक सिस्टम बना कर रखा है। हर अधिकारी किसी न किसी सत्ताधारी की गोद में बैठा है। ऐसे में साहब उम्मीदों के जाल में फंसे नजर आ रहे हैं।
साहब गांठ बांध लेते हैं
जनता से सीधे जुड़ाव वाले एक विभाग के साहब इन दिनों चर्चा में हैं। नब्ज टटोलते -टटोलते, कानूनी दांव-पेंच सीख कर आए साहब अपने ही मातहतों के बीच फूट डालो और राज करो की रणनीति अपनाए हुए हैं। साहब जिस पर मेहरवान हो गए वो ‘पहलवान’ हो जाता है और जिस पर नाराज हो गए उसका सब कुछ छीनकर ‘पैदल’ करने की हद तक चले जाते हैं। साहब के इसी रूप का शिकार उनके कुछ मातहत हुए हैं। अब इन मातहतों को यह समझ नहीं आ रहा कि साहब की नाराजगी की वजह क्या है लेकिन साहब के कोप भाजन बने मातहतों के बीच चर्चा आम है,कि साहब न जाने किस बात को गांठ बांध लें?
पार्टी को कहां ले जाएंगे 'फूफा जी'
कभी देश व प्रदेश की सत्ता की धुरी रही कांग्रेस आज सत्ता से बाहर चल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है पार्टी के अंदर गुटबाजी और नेताओं के बीच आपसी खींचतान है, वर्षों पहले कांग्रेस को लगा यह रोग इन दिनों सत्तारूढ़ दल भाजपा के नेताओं में बखूबी नजर आ रहा है, जिले में सत्तारूढ़ नेताओं के बीच आपसी खींचतान जग जाहिर है। ऊपरी तौर पर देखने में पार्टी नेता जरूर एकजुट और साथ-साथ नजर आते हैं, ऊपर से सब कुछ ठीक-ठाक दिखता है, लेकिन जैसा दिख रहा है वैसा है नहीं। जैसे किसी बारात में ‘फूफा’ मौजूद तो रहते हैं पर नाराज और बारात से कटे-कटे कुछ वैसे ही हाल पार्टी नेताओं के हैं। हर नेता अपनी ढपली- अपना राग अलाप रहा है। जिससे पार्टी कार्यकर्ता भी भ्रमित हैं कि वे किस नेता के साथ खड़े नजर आएं? दरअसल कार्यकर्ता इस असमंजस में है कि जैसे लौटी बारात के बाद फूफा जी अपनी सेवा- सहाई से खुश हो जाते हैं, ठीक वैसे ही भले ही आज पार्टी में फूफा जी बने नेता इधर-उधर घूम रहे हैं, पर जैसे ही उन पर पार्टी के अनुशासन का चाबुक चलेगा वैसे ही वे सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। जिले में अभी सत्तारूढ़ नेताओें के बीच जो आपसी खींचतान दिख रही है उससे पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता सशंकित है कि आखिर पार्टी के फूफाजी भाजपा को ले कहां जाना चाहते हैं?
और मोटी हो गई विभाजन की रेखा
कहते हैं, नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है। कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए भाजपा की नकल तो करना चाह रही है, पर उसमें अपनी अकल जरा भी नहीं लगाना चाहती। संगठन की मजबूती के लिए पार्टी ने बीते दिनों संगठन सृजन अभियान चलाया, वैसे तो यह अभियान संगठन की मजबूती के लिए था, लेकिन जिस तरह से संगठन की कमान अपने हांथ में लेने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं ने अपने- अपने दांव - पेंच चले उसने आपस में विभाजन की ऐसी रेखा खींच दी है जो अभी सामने तो नजर नहीं आ रही है, पर समय के साथ-साथ यह रेखा और मजबूत होती जाएगी। वैसे भी कभी समाजसेवा का एक माध्यम रही राजनीति आज पॉवर व स्टेटस सिम्बल बन गई है ऐसे में पार्टी के प्रति निष्ठा और समर्पण जैसे शब्द बेमानी नजर आने लगे हैं, अगर कुछ रह गया तो अपना और अपनों का विकास?

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पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
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जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।
रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
सतना संभाग में बिजली विभाग की ‘कुर्सी’ को लेकर मची होड़, नए अफसर के आने से विभाग में लगा ‘करंट’। स्मार्ट मीटर से लेकर वसूली तक की नई योजनाएं, और गर्मी में सोए अधिकारी अब बारिश में ‘चार्ज’ होकर आम जनता पर टूटे। पढ़ें बृजेश पाण्डेय की तीखी और चुटीली रिपोर्ट।
रीवा में आयोजित पर्यटन कान्क्लेव ने विंध्य क्षेत्र में पर्यटन विकास की नई शुरुआत की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा चित्रकूट, मुकुंदपुर, संजय दुबरी जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने की पहल न केवल क्षेत्रीय विकास, बल्कि रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण को भी गति देगी।
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