रीवा में गैस चलित शवदाह गृह दो साल से बेकार पड़ा, एक भी शव का दाह संस्कार नहीं, जागरूकता की भारी कमी।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
बंदरिया मुक्तिधाम में दो साल पहले 70 लाख की लागत से गैस चलित शवदाह गृह बना। टेस्टिंग भी हो गई। परिषद से रेट फाइनल हो गए लेकिन लोगों की सोच नहीं बदल पाई। अब भी लोग शव का अंतिम संस्कार बंदरिया मुक्तिधाम में लकड़ियों से ही कर रहे हैं। गैस चलित शवदाह गृह में डेड बॉडी जलाने कोई नहीं जा रहा। 2 साल से एक अदद डेड बॉडी का इंतजार हो रहा है। मशीन कहीं खराब न हो जाए इसलिए सप्ताह में सिर्फ बटन ऑन-ऑफ ही हो रही है।
आपको बता दें कि कोविड के बाद हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी किया था। 1 लाख से ऊपर की आबादी वाले शहरों में इलेक्ट्रिक और गैस चलित शवदाह गृह स्थापित करना आनिवार्य किया गया था। इसी आदेश के तहत मप्र शासन ने सभी नगरीय निकाय को इलेक्ट्रिक और गैस से चलने वाले शवदाह गृह स्थापित करने के आदेश जारी किए थे। रीवा में शासन के आदेश के बाद बंदरिया में गैस चलित शवदाह गृह स्थापित किया गया।
संयंत्र और सिविल वर्क में करीब 65 से 70 लाख रुपए खर्च किए गए थे। शवदाह गृह का निर्माण होने के बाद भोपाल मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान भोपाल से परीक्षण के लिए प्रोफेसर्स भी पहुंचे थे। ट्रायल भी सफल रहा। परिषद की बैठक में शवदाह का रेट भी स्वीकृत हो गया। इसके बाद से बंदरिया में स्थापित शवदाह गृह को डेडबॉडी का इंतजार हो रहा है। एक भी परिजन गैस चलित शव दाह गृह में अपनों की डेड बॉडी जलाने के लिए आगे नहीं आए। लोगों की सोच को नगर निगम बदलने के लिए कोई प्रयास नहीं कर पाया। नगर निगम ने एक डेड बॉडी के लिए 2300 रुपए फीस तय की है। फीस भी लोगों की इससे दूरी का बड़ा कारण माना जा सकता है।
गुजरात की कंपनी ने किया था स्थापित
गैस चलित शवदाह गृह को गुुजरात की कंपनी ने इंस्टाल किया था। सिर्फ संयंत्र की कीमत करीब 33 लाख रुपए थी। इसके अलावा इतनी ही राशि सिविल वर्क में खर्च हुआ था।
शवदाह में 1 घंटे का लगता है समय
नगर निगम के उपयंत्री अभिनव द्विवेदी ने बताया कि गैस चलित शवदाह गृह को पहली बॉडी के लिए तैयार होने में कम से कम 1 घंटे का समय लगता है। इसके बाद आने वाली डेड बॉडी के दाह संस्कार में कम समय लगता है। बर्नर और भट्ठी के गर्म होने के बाद समय घटता जाता है।
लोग जागरुक होंगे तभी बनेगी बात
गैस चलित शवदाह गृह में अंतिम संस्कार को लेकर लोग अभी भी जागरुक नहीं है। बंदरिया में शव लेकर पहुंचने वाले लोग अभी भी पुरानी परंपरा के तहत ही लकड़ियों से ही अंतिम संस्कार कर रहे हैं। जब तक लोग जागरुक नहीं होंगे, तब तक गैस चलित शवदाह गृह रन भी नहीं कर पाएगा। इसके लिए नगर निगम को ही प्रयास करना होगा। प्रचार प्रसार के साथ ही लोगों के जागरुक करने की दिशा में काम करना होगा।
2 साल से एक सिलेंडर नहीं बदले गए
इस संयंत्र को चलाने के लिए 20 कामर्शियल सिलेंडर लगाए गए हैं। वर्ष 2024 में यह संयंत्र शुरू हो गया था। तब 20 सिलेंडर इसके संचालन के लिए लगाए गए थे। आज तक एक भी सिलेंडर बदला नहीं गया। वहीं सिलेंडर अब भी चल रहे हैं।
हफ्ते-हफ्ते टेस्टिंग करता रहता है ननि
संयंत्र को शुरू हुए 2 साल हो गए। अब इसे नगर निगम बिना चलाए छोड़ भी नहीं सकता। लाखों रुपए इसके निर्माण पर खर्च किया गया है। यही वजह है कि अब नगर निगम के सामने इसे चलाना भी मजबूरी बन गया है। संयंत्र के कलपुर्जें, कंट्रोल पैनल कहीं खराब न हो जाए इसी वजह से ननि के कर्मचारी सप्ताह में एक बार इसकी टेस्टिंग जरूर करते हैं। बर्नर को चलाकर कुछ देर के लिए छोड़ देते हैं। बाद में बंद कर फिर लौट जाते हैं।


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