रीवा संभाग के पुलिस महकमे में इन दिनों सोशल मीडिया शेरनी-टाइगर की जुगलबंदी, प्रमोशन की उम्मीदें, तबादलों की बेचैनी और रसूखदार थानेदारों की सिफारिशों का दौर चर्चा में है। पढ़िए अमित सेंगर का 'थर्ड डिग्री' कॉलम - व्यंग्य में लिपटी हकीकत।

हाइलाइट्स
शेरनी और टाइगर की जुगलबंदी
यह चर्चा चिड़ियाघर की नहीं, बल्कि पुलिस महकमे की है। इन दिनों नए जिले में दो प्रभारी सोशल मीडिया पर अपनी जांबाजी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एक हाईवे के थाने से है, तो दूसरी जिले की सीमा से लगे थाने से। एक ने यह दावा कर शुरूआत की कि अब चोरों, अपराधियों और अवैध कारोबारियों की खैर नहीं। यह कहकर उन्होंने अपने बड़े साहब का ध्यान खींचा। अब ऐसे में दूसरी प्रभारी (मोहतरमा) कैसे पीछे रहतीं? उनके लिए भी सोशल मीडिया पर गुणगान शुरू हो गया, गीत लिखे जाने लगे और उन्हें शेरनी से भी तेज बताया गया। दोनों के सोशल मीडिया प्रेम को देखकर पुलिस गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि ‘करनी-करतूत तो कुछ भी नहीं, बस शोर ऐसा मचा रहे हैं, जैसे कोई बड़ा तीर मार लिया हो।’ एक के इलाके में तेल के अवैध कारोबार ने खूब शोहरत बटोरी है, और कहा जा रहा है कि इस खेल की मलाई कई खा रहे हैं। वहीं, दूसरे के इलाके में तमाम दावों के बावजूद चौपायों का अवैध कारोबार जारी है।
आमदनी पर आकर अटकी उम्मीद
एक पुलिस अधिकारी ने सोचा था कि प्रमोशन के बाद उन्हें अच्छी फील्ड पोस्टिंग मिलेगी। इसके लिए उन्होंने हर तरह के प्रयास किए और आखिरकार उनकी पोस्टिंग एक 'धार्मिक स्थल' में हो गई। जॉइनिंग के बाद उन्होंने अनुभाग के थानों का तेजी से निरीक्षण शुरू किया, जिससे लगा कि वे काम में कसावट लाना चाहते हैं, लेकिन सारी कवायद के पीछे कुछ और था। साहब ने पता लगाना शुरू किया कि अपेक्षा किस रास्ते पूरी होगी। पर उन्हें करारा झटका लगा, क्योंकि अपेक्षा के सारे रास्ते बड़े साहब ने बंद कर रखे हैं, आय के हर रास्ते पर बड़े साहब की नजर है, सो छोटे साहब ने दूसरा रास्ता अपनाया। अपनी अपेक्षा पूरी करने के लिए छोटे मातहतों को रोज कुछ न कुछ काम सौंपते हैं। छोटे मातहत मना करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, जो छोटे साहब की अपेक्षा पूरी नहीं कर पा रहे हैं उन्हें दूसरा 'बोझ' झेलने का इशारा मिले रहा है। वैसे साहब जहां से आए हैं, वहां का पिछला रिकॉर्ड भी अपेक्षा वाला रहा है।
काम न आई सिफारिश
संभागीय मुख्यालय के एक थानेदार को अपना मौजूदा थाना पसंद नहीं आ रहा। दबंग छवि वाले इस थानेदार ने तबादले के लिए हर तरह का राजनीतिक रसूख इस्तेमाल किया। उन्होंने कई नेताओं से सिफारिश करवाई और कुछ बड़े पुलिस अधिकारियों से भी संपर्क साधा। जब साहब के पास लगातार फोन आने लगे, तो शांत मिजाज के स्वभाव वाले साहब का पारा गर्म हो गया। साहब ने थानेदार को दो टूक शब्दों में कह दिया कि ‘या तो जहां हो वहीं रहकर बेहतर तरीके से काम करो या फिर दूसरे जिलों में अपनी पसंदीदा जगह तलाश लो।’ साहब का सीधा जवाब सुनकर दबंग थानेदार छुट्टी पर चले गए। गलियारों में यह चर्चा है कि उन्होंने तबादले के लिए तर्क दिया था कि उनके कार्यस्थल में कोई 'दोष' है, जिसके कारण लगातार गड़बड़ियां हो रही हैं। हालांकि, असलियत में गड़बड़ियों का कारण उनकी खुद की कार्यशैली है, न कि कोई दोष।
तबादले को लेकर बेचैनी
काफी समय से एक ही जगह पर जमे प्रभारियों का मन अब बदलाव चाहता है। वे नई जगहों पर जाने के लिए बेचैन हैं और अपने-अपने स्तर पर यह पता लगाने में जुट गए हैं कि क्या बड़े साहब तबादला करने के मूड में हैं, लेकिन उन सबको झटका लगा, क्योंकि साहब ने स्पष्ट कर दिया है कि अभी कोई तबादला नहीं होगा। उन्होंने कहा, ‘जहां हो, वहीं रहकर बेहतर काम करो, अगर ज्यादा हाथ-पैर मारे, तो अगली पोस्टिंग 'लाइन' में मिलेगी।’ दरअसल, इन प्रभारियों को लग रहा था कि साहब ने अपने कार्यकाल के रिकार्ड तोड़ पारी खेल ली है और वे अब भी नाबाद हैं। शायद साहब कहीं और के लिए प्रयासरत हों, ऐसे में वे कुछ नया प्रयोग करें। साहब ने इशारे-इशारे में जाहिर कर दिया कि अभी वे अपनी पारी खेलते रहेंगे, न तो वे बदलाव के मूड में हैं और न ही किसी का बदलाव करने वाले, पर साहब ने साफ कर दिया है कि ‘जो जैसा है, वैसा ही रहेगा।’ इसलिए तबादले का इंतजार कर रहे अधिकारियों को अभी और इंतजार करना होगा, क्योंकि साहब की यह पारी अभी जारी रहेगी।

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