रीवा का संजय गांधी अस्पताल गंभीर अव्यवस्थाओं का शिकार है। मरीजों की चीखें, परिजनों की गुहार और डॉक्टरों की बेरुखी मिलकर बनाते हैं दर्द की दास्तान। रात में इलाज के बजाय डॉक्टर निजी क्लिनिक में व्यस्त, अस्पताल प्रशासन लाचार।

एसजीएमएच की कहानी, मरीज के परिजनों की जुबानी
रीवा, स्टार समाचार वेब
शाम ढलने के बाद संजय गांधी अस्पताल में संवेदनाएं मर जाती है। दीवारों से टकराकर गूंजती मरीजों की चीख, परिजनों के मदद की गुहार भी जिम्मेदारों के कान तक नहीं पहुंच पाती। नियमित खानापूर्ति कर अगले 24 घंटे के लिए बेखबर होने वाले वरिष्ठ चिकित्सक दुकानदारी में व्यस्त हो जाते हैं। पीछे छूट जाती है अव्यवस्था और अथाह दर्द की कभी न खत्म होने वाली दास्तान।
जी हां हम बात कर रहे हैं वर्षों के अथक परिश्रम के बाद तैयार हुए 800 बिस्तर वाले विंध्य के सबसे बड़े संजय गांधी अस्पताल की। जहां पग-पग पर बीमार चेहरे हाथ जोड़कर ईश्वर का रूप कहे जाने वाले चिकित्सकों के इर्द-गिर्द मंडराते नजर आते हैं। जूनियर चिकित्सकों के भरोसे अस्पताल की व्यवस्था का दम्भ भरने वाले वरिष्ठ चिकित्सक भर्ती मरीजों के दर्द की दास्तान मात्र अपने बंगले में या निजी नर्सिंग होम में ही सुन पाते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। मौसम के तीखे तेवर के बाद फैली जलजनित बीमारियों ने आम लोगों का जहां जीना दुश्वार कर दिया है, वहीं अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक भर्ती मरीजों का इलाज करने से कतराने लगे हैं। इतना ही नहीं मरीजों के परिजनों को यह सलाह देने से भी नहीं चूकते कि यहां से अच्छा किसी अन्य अस्पताल में ले जाएं। ऐसे में यह माना जा सकता है कि मरीज एवं अस्पताल के बीच निजी अस्पतालों के वरिष्ठ चिकित्सक दलाली करने लगे हैं।
संजय गांधी एवं गांधी मेमोरियल अस्पताल की व्यवस्थाएं ठेके पर जाने के बाद हालत बद से बदतर हो रही है। गंदगी से पटे वार्डों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। सफाई एवं सुरक्षा के लिए हाइट्स कंपनी को पहले से दस गुना ज्यादा में दी गई व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। इतना ही नहीं सुरक्षा एवं साफ-सफाई पर प्रश्न चिन्ह खड़े हो गए हैं।
बंगले पर लगता है मेला
संजय गांधी एवं गांधी मेमोरियल अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सकों के बंगलों पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो सुबह से देर रात तक मरीजों का मेला लगा रहता है। ऐसे में वह भर्ती मरीजों को किस तरह देख पाएंगे यह अपने आप स्पष्ट हो जाता है। कुछ रसूखदार मरीजों को देखने भले ही वह अस्पताल के वार्डों तक आ जाएं परंतु अन्य मरीजों को चलकर उनके बंगले जाना पड़ता है तभी उनका अस्पताल में इलाज संभव है।
रात के सन्नाटे में गूंजती हैं चीखें
संजय गांधी अस्पताल में भर्ती मरीज जिन्हें गंभीर वार्ड में रखा जाता है, उनमें से कुछ ही स्वस्थ होकर घर लौट पाते हैं। वरिष्ठ चिकित्सकों के उपेक्षित रवैये से अक्सर रात के सन्नाटे में मरीज के परिजनों की चीखें गूंजती हैं। कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब परिजन चिकित्सक एवं ड्यूटी नर्सों की तलाश में ऊपर से नीचे तक भाग दौड़ करते हैं और वह नहीं मिल पाते। लिहाजा उनका मरीज बिस्तर पर ही दम तोड़ देता है। असहाय परिजन रात के सन्नाटे में रोते बिलखते सुबह का इंतजार करते शव को लेकर अपने घर की ओर रवाना हो जाते हैं। इस बात की जानकारी वरिष्ठ चिकित्सकों सहित अधिकारियों को होने के बावजूद भी वह दुकानदारी प्रथा पर नकेल नहीं लगा सके हैं। भर्ती मरीजों के परिजन नाम न छापने की शर्त पर यह बताते हैं कि बंगले में दिखाने के बाद जब उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाता है उसके बाद भी चिकित्सक मरीजों को देखने नहीं आते। अलबत्ता वह अस्पताल में मौजूद जूडा को इलाज समझाकर फिर अपने कार्य में मस्त हो जाते हैं।


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