नईगढ़ी क्षेत्र में आवारा मवेशियों ने किसानों की नींद उड़ा दी है। खेतों की फसलें बर्बाद हो रही हैं और लगभग 40% किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। सरकार की गौशाला योजना अधर में लटकी है।

हाइलाइट्स
नईगढ़ी, स्टार समाचार वेब
बीते कुछ वर्षों से जिले का किसान रोंझ तथा पशुओं से परेशान है। इनकी चहल कदमी ने किसानों का जीना मुश्किल कर दिया है। इन पशुओं के आतंक से लगभग 40 प्रतिशत किसानों ने खेती के पेशे से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। जिसका असर कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था पर भी आ रहा है।
वैसे भी 7 दशक की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसान हमेशा से छला जाता रहा है। कभी उसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है तो कभी वह सरकारी तंत्र का शिकार हुआ है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश सरकारी तंत्र द्वारा किसानों की अनदेखी साबित करती है कि इस देश का किसान कितना कमजोर होगा। समय-समय पर डंकल जैसी महंगी और विदेशी प्रस्ताव और किस्में सरकार द्वारा लाए जाने पर किसानों की कमर इस कदर टूट चुकी है कि वह सीधा होने का नाम ही नहीं ले पा रही हैं।
अतीत में भारतीय कृषि उद्योग का समूचा विश्व समुदाय कायल रहा है। भारत का कृषि व्यापार स्वर्ण मुद्राओं के बदले होता था लेकिन आवारा पशुओं ने इस व्यापार को पलीता लगा दिया। आज देश का किसान रो रहा है लेकिन उसकी ओर गहराई से देखने वाला कोई भी नहीं है। 70 के दशक में भारतीय किसान संघ के साथ साथ अन्य संगठनों ने किसानों में अपने अधिकार के प्रति चेतना लाने का प्रयास किया जो आज फलीभूत होने लगा है। इन आंदोलनों के परिणाम स्वरूप कृषि आज की चर्चा का विषय तो बनी और सरकारों द्वारा किसानों की आय बढ़ाने का दावा और वादा भी किया जाने लगा है, लेकिन अधिकांश किसान संगठनों द्वारा राजनीतिक रोटी सेकने के चक्कर में देश का बदहाल किसान और पिसता नजर आ रहा है। दूसरी तरफ खाद बीज कीटनाशक और महंगी कृषि तकनीकों ने भी किसानों की कमर तोड़ दी है और उस पर पशुओं का खुलेआम घूमना कृषि की बदहाली पर आग में घी का काम कर रही है। आज आलम यह हो गया है कि खेतों में फसल की जगह दिन-रात आवारा पशु ही दिखाई देते हैं। इन आवारा पशुओं ने किसानों का जीना हराम करने के साथ-साथ किसानों की नींद भी उड़ा दी है।
आम जनता भी दोषी
पशुओं से हो रही किसानों की बदहाली की जितनी जिम्मेदार सरकार की है, उससे कई गुना दोषी स्वयं आम जनमानस है। जो गाय दूध देना बंद कर देती है, उसे वह खूंटे से बांधना नहीं चाहता है। जब से ट्रैक्टर से खेती होने लगी तब से खेती में बैलों का भी महत्व घट गया है। बैल भी खुले में छोड़ने से कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जिसके कारण किसान का खेती से मोहभंग हो रहा है। यही स्थिति रही तो आने वाले समय में किसान तो दम तोड़ेगा ही आम जनमानस को भी नुकसान उठाना पड़ेगा।
नहीं बनी गौशाला
शासन द्वारा किसान एवं गोवंश हित में ऐलान किया गया था कि पशुओं के हित और किसानों की फसल के सुरक्षा के मद्देनजर निहित किए गए स्थानों में गौशाला का निर्माण कराया जाएगा। जहां पशुओं को भोजन पानी आदि की समुचित व्यवस्था होगी। इस योजना के तहत नईगढ़ी के ग्राम पंचायत पैकनगांव, कोट एवं शिवराजपुर में गौशाला खोले जाने के लिए आदेश किए गए, लेकिन आज तक शासन के आदेश का जमीनी रूप से पालन न होने के कारण पशुओं के धमा चौकड़ी से किसानों की फसल नष्ट हो रही है। किसानों के कड़ी मेहनत से तैयार की गई खेतों में लहलहाती फसल को जब आवारा पशु नष्ट कर देते हैं तो किसान आवेश में आकर इनके साथ मारपीट मुंह बांध देना और इस तरह के अत्याचार किए जाते हैं कि हालात काफी दर्दनाक होते हैं। वहीं पशुपालक जो कभी अपने पशुओं को अपनी औलाद की तरह मानता था, आज दुश्मन सा रूप धारण कर चुका है। लेकिन क्षेत्र में हो रही गोवंश की तस्करी एवं गोवंश के साथ हो रहे अन्याय की ओर न तो आज तक जिम्मेदार पशुपालक ही चेता और न ही शासन और प्रशासन जिसके कारण जहां एक और आवारा पशुओं से किसानों की खड़ी खेती नष्ट हो रही है, तो वही दूसरी ओर पशुओं के साथ हो रहा अत्याचार चरम पर है।


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