सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों को लेकर पांच साल जेल में बंद स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा-गवाहों की जांच पूरी होने या अब से एक वर्ष के भीतर, वे जमानत के लिए फिर से निचली अदालत में जा सकते हैं।
By: Arvind Mishra
Jan 05, 202611:47 AM
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों को लेकर पांच साल जेल में बंद स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा-गवाहों की जांच पूरी होने या अब से एक वर्ष के भीतर, वे जमानत के लिए फिर से निचली अदालत में जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि दोनों के मामले पर इस आदेश का कोई प्रभाव डाले बिना विचार किया जाए। जस्टिस रविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने उमर और शरजील को छोड़कर अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी। उक्त सभी आरोपी 2020 के दिल्ली दंगों में अपनी भूमिका के लिए पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं। उमर खालिद और शरजील इमाम को छोड़कर अन्य आरोपी जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आ जाएंगे। इन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामले में जमानत देने से इंकार कर दिया गया था।
2020 में हुआ था दंगा
यह मामला 2020 के दंगों के पीछे बड़ी साजिश से जुड़ा है। ये दंगे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के विरोध के बीच भड़के थे, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
पांच को 12 शर्तों के साथ जमानत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद समीर खान, शादाब अहमद और शिफाउर रहमान को जमानत मिलने से उनके खिलाफ लगे आरोपों में कोई नरमी नहीं आती। उन्हें करीब 12 शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाएगा। यदि शर्तों का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट आरोपियों की सुनवाई के बाद जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा।
आरोपियों के साथ समान व्यवहार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति के मामले का फैसला उनकी भूमिकाओं के आधार पर अलग-अलग किया गया है। सभी अपीलकर्ताओं को दोषसिद्धि के मामले में समान दर्जा नहीं दिया जा सकता। कुछ आरोपियों का आचरण सहायक प्रकृति का प्रतीत होता है। सभी आरोपियों की भूमिका तय की जानी चाहिए। सभी के साथ समान व्यवहार नहीं किया जा सकता। अदालत को भ्रम पैदा करने से बचना चाहिए। सभी आरोपियों के साथ समान व्यवहार करने से मुकदमे से पहले हिरासत में रखने को बढ़ावा मिलेगा।
वैधानिक अर्थ की जांच आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैधानिक अर्थ की जांच आवश्यक है। यूएपीए की धारा 50 के वैधानिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है। यूएपीए की धारा 45 अधिनियम के तहत आतंकवादी कृत्य को परिभाषित करती है। अधिनियम संसद के इस विचार को दर्शाता है कि तत्काल शारीरिक हिंसा के अभाव में भी समाज के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। जांच अभियोजन पक्ष के निष्कर्षों पर आधारित है और यह भी कि क्या आरोपी की गतिविधि प्रत्यक्ष आतंकवादी कृत्य या षड्यंत्रकारी कृत्य के अंतर्गत आती है।