मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं।

मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं। यह फजीहत यानी पूरा खेल आरक्षित सीटों (अनुसूचित जाति/जनजाति) से चुनाव लड़ने और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से सरकारी और ओहदेदार नौकरी पाने से जुड़ा है।
हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में जानकारी दी है कि जाली जाति प्रमाण पत्र से सरकारी नौकरी करने वालों के करीब ढाई सौ केसों की जांच चल रही है। राज्य स्तरीय छानबीन समिति के पास 15 वर्षों में 7,000 केस लंबित हैं। इसी तरह के 17,000 केस विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। पिछले 10 वर्षों में फर्जी जाति या विकलांगता प्रमाण पत्रों का उपयोग करके सरकारी नौकरियां प्राप्त करने के 350 प्रकरण उजागर हुए हैं। 24 अधिकारियों को दोषी भी करार दिया जा चुका है। यही नहीं, मध्यप्रदेश में 600 क्लॉस वन अधिकारियों के जाति प्रमाण-पत्र संदेह के घेरे में हैं। यह मुद्दा उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी उठ चुका है। वहीं मध्यप्रदेश विधानसभा सत्र के दौरान, कांग्रेस विधायक हीरालाल अलावा ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के माध्यम से सरकारी नौकरियां प्राप्त करने वाले लोगों के मुद्दे को भी उठाया था। जिम्मेदारों के फर्जीवाड़े पर स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
राज्यमंत्री टेटवाल भी फंस गए
दरअसल, यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब मध्य प्रदेश के सारंगपुर से विधायक राज्य मंत्री गौतम टेटवाल पर भी आरोप लगे हैं। उन पर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से फर्जी जाति प्रमाण-पत्र का इस्तेमाल करके चुनाव लड़ने का आरोप है। उनके खिलाफ इंदौर उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है। केस की सुनवाई चल रही है। उन पर आरोप है कि उनके स्कूली दस्तावेजों में जाति जीनगर दर्ज है, लेकिन उन्होंने अनुसूचित जाति के तहत चुनाव लड़ा। उनके वकील ने हाई कोर्ट में नए दस्तावेज पेश किए, जिसके बाद सुनवाई टल गई है। कांग्रेस ने उन पर दो जाति प्रमाण-पत्र का आरोप लगाया है। इस मामले में सबसे अहम बिंदु एक ही स्कूल से जारी दो अलग-अलग जाति संबंधी प्रविष्टियों का है। याचिकाकर्ता का दावा है कि राज्यमंत्री के पुराने स्कूली दस्तावेजों में उनकी जाति जीनगर और वर्ग पिछड़ा दर्ज है। 2007 और 2013 में आरटीआई के माध्यम से प्राप्त रिकॉर्ड में भी यही जानकारी अंकित होने का दावा किया गया है।
जाति प्रमाण-पत्र में उलझ चुकीं प्रतिमा बागरी
0 शिकायतकर्ता सिद्ध नहीं कर पाए कानूनी पक्ष
कांग्रेस ने नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण- पत्र को फर्जी करार दिया है। मध्यप्रदेश अनुसूचित जाति कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने कहा-प्रतिमा बागरी ने अनुसूचित जाति के आरक्षण का गलत तरीके से लाभ उठाया और मंत्री पद हासिल किया। बागरी अनुसूचित जाति नहीं, राजपूत और ठाकुर समुदाय में आते हैं। प्रतिमा बागरी ने सतना जिले में रैगांव सीट से 36,060 वोटों से चुनाव जीती हैं। उन्होंने कांग्रेस की कल्पना वर्मा को हराया था। रैगांव सीट एससी के लिए आरक्षित है, लेकिन तथ्य यह है कि बुंदेलखंड, महाकौशल और विंध्य क्षेत्र में रहने वाले बागरी जाति के लोग मूल रूप से ठाकुर (राजपूत) समुदाय से आते हैं और अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आते। हालांकि राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी को जाति प्रमाण-पत्र विवाद में हाई कोर्ट से थोड़ी राहत मिली है। शिकायतकर्ता कानूनी पक्ष सिद्ध नहीं कर पाए, जिससे याचिका खारिज हो गई।
सलूजा से छिना पूर्व विधायक लिखने का अधिकार
0 फर्जी जाति प्रमाण पत्र में फंसे, वसूली जाएगी पेंशन
सुप्रीम कोर्ट ने गुना के पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह सलूजा के खिलाफ जाली अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र का इस्तेमाल कर चुनाव लड़ने के केस में आपराधिक कार्रवाही को बहाल कर दिया। मतलब सलूजा एक बार के विधायक भी नहीं कहलाएंगे। साथ ही कोर्ट ने उनसे पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाएं वापस लेने का आदेश दिया। वे भले वर्ष 2008 में भारतीय जनशक्ति पार्टी से चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचे हों, लेकिन उनका भूतकाल शून्य हो गया। गुना की विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। सलूजा 15 वर्ष पहले इस सीट से विधायक चुने गए थे। फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद वे पूर्व विधायक भी नहीं लिख पाए। यह फैसला उनके फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में आया है। भाजपा प्रत्याशी का पर्चा खारिज होने पर सलूजा ने सांसी समुदाय का जाति प्रमाण-पत्र लगाया। आरक्षण का लाभ लेते हुए सलूजा चुनाव जीते और विधायक बने। शिकायत के बाद 10 अगस्त 2011 को उनका जाति प्रमाण-पत्र निरस्त कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन उन्हें हर जगह हार मिली। 2016 में पार्षद वंदना पांडे ने एक जनहित याचिका दायर की थी।
फर्जीवाड़े में विधायक जजपाल सिंह जज्जी को बड़ी राहत
0 हाईकोर्ट ने नट जाति के प्रमाण पत्र को ठहराया सही
अशोकनगर विधायक जजपाल सिंह जज्जी के नट जाति के प्रमाण -पत्र को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सही ठहराते हुए उन्हें राहत दी थी। अगस्त 2023 में ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने एकल पीठ के उस पुराने आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें जज्जी के जाति प्रमाण पत्र को फर्जी बताते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और विधानसभा सदस्यता खत्म करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद जज्जी के नट जाति के प्रमाण पत्र को वैध माना है। अदालत ने कहा कि जज्जी को नट जाति का माना जाएगा और इससे उनकी विधायकी पर मंडरा रहा संकट टल गया। 2018 के विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ लड़ने वाले भाजपा नेता लड्डूराम कोरी ने याचिका दायर की थी। आरोप था कि जज्जी ने अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीट से फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ा था। हाईकोर्ट के अंतिम आदेश (9 अगस्त 2023) के अनुसार उनका प्रमाण-पत्र सही पाया गया है और उनके खिलाफ लगे फर्जीवाड़े के आरोपों को खारिज कर दिया गया।
पूर्व सांसद ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण-पत्र हो चुका निरस्त
0 उच्च स्तरीय छानबीन समिति का किया गया था गठन
मध्यप्रदेश के बैतूल लोकसभा (एसटी) क्षेत्र से तत्कालीन भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण-पत्र तत्कालीन कलेक्टर तरुण पिथोड़े ने निरस्त कर दिया था। उच्चाधिकार छानबीन समिति ने सांसद ज्योति धुर्वे के जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त करने संबंधी अपने पिछले निर्णय को बरकरार रखा। धुर्वे 2009 में बैतूल लोकसभा क्षेत्र से पहली और 2014 में दूसरी पहली दफा निर्वाचित हुई। छानबीन समिति की जांच के आधार पर आयुक्त दिपाली रस्तोगी द्वारा छह फरवरी को जारी आदेश में कहा गया कि धुर्वे की जाति निर्विवाद रूप से बिसेन/पवार हैं और यह मप्र में अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित नहीं है। धुर्वे को जाति गोंड़ (एसटी) के आधार पर जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने का भी निर्देश दिया। धुर्वे के खिलाफ एक शिकायत के बाद विभाग ने उच्च स्तरीय छानबीन समिति का गठन किया गया था। समिति ने अप्रैल 2017 को निर्णय दिया था कि धुर्वे का गोंड एसटी जाति के आधार पर जारी किया गया गया प्रमाण पत्र सही नहीं है तथा इसे निरस्त और जब्त किया जाना चाहिए।
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पूर्व सांसद केपी यादव और उनके बेटे का जाति प्रमाण पत्र कैंसिल
-गुना लोकसभा सीट से सिंधिया को हराकर बटोरी थी सुर्खियां
दिसंबर-2019 में गुना से भाजपा सांसद रहे केपी यादव का ओबीसी प्रमाण पत्र अशोकनगर जिला प्रशासन ने इस आधार पर रद्द कर दिया था कि उनकी आय 8 लाख से अधिक थी। यादव के साथ उनके बेटे का भी ओबीसी प्रमाण-पत्र कैंसल कर दिया गया था। केपी यादव कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना से हराकर सुर्खियों में आए थे। ये मामला 2014 का है। दोनों आय में अंतर होने पर उस समय मुंगावली से कांग्रेस विधायक ब्रजेंद्र सिंह यादव ने इसकी शिकायत एसडीएम से की थी। केपी यादव के बेटे को जुलाई में ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी किया गया था, क्योंकि उनके पिता की आय 5 लाख दिखाई गई थी। जबकि 8 लाख या उससे अधिक की वार्षिक आय वाले व्यक्तियों के बच्चे ओबीसी के लिए आरक्षित आरक्षण लाभों के हकदार नहीं हैं। केपी यादव और उनके बेटे सार्थक यादव के खिलाफ धारा 420,120बी 181 एवं 182 के तहत मामला भी दर्ज हुआ था।
पूर्व विधायक के आईपीएस पति को लग चुका झटका
भाजपा की पूर्व विधायक ममता मीणा के पति और आईपीएस आॅफिसर रहे रघुवीर सिंह मीना फर्जी जाति प्रमाण-पत्र से नौकरी पाने के आरोपों में घिरे रहे हैं। जांच के बाद राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने उनके जाति प्रमाण-पत्र को गलत पाया था। रघुवीर सिंह मीना 1986 में डीएसपी के पद पर भर्ती हुए और 2002 में आईपीएस अवॉर्ड हो गए थे। बाद में उनके जाति प्रमाण पत्र को लेकर शिकायत हुई। मीना खुद को आदिवासी बताते रहे हैं। उन्होंने विदिशा के लटेरी से 1983 में जाति प्रमाण पत्र बनवाया था। राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने पुलिस महानिरीक्षक विजिलेंस की शिकायत पर जांच की और जांच में इस जाति प्रमाण पत्र को गलत पाया था।
एएसपी पर हो चुकी एफआईआर दर्ज
मध्यप्रदेश के एक एएसपी पर जाति प्रमाण-पत्र के मामले में एफआईआर तक दर्ज हो चुकी है। एएसपी अमृतलाल मीणा ने अनुसूचित जनजाति के प्रमाण-पत्र के आधार पर पुलिस की नौकरी पाई थी, लेकिन शिकायत के बाद जांच हुई। राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने 19 फरवरी 2016 को अपने निर्णय में जाति प्रमाण पत्र में निरस्त कर दिया। मीणा इसके बाद हाईकोर्ट भी गए, लेकिन दिसंबर-2023 में कोर्ट का स्टे आॅर्डर हटते ही उनके खिलाफ धोखाधड़ी की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली गई।
आईएएस संतोष वर्मा को जाना पड़ा जेल
आईएएस संतोष वर्मा का विवादों से पुराना नाता है। ब्राह्मणों पर की गई विवादित टिप्पणी के बाद उनके पुराने आपराधिक मामलों और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोपों को सतह पर ला दिया। दरअसल, राज्य सेवा के अधिकारी से आईएएस पद पर प्रमोशन पाने के दौरान उन पर गंभीर आरोप लगे थे, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। 2021 में आईएएस पद पर प्रमोशन के लिए उन्होंने दो जाली दस्तावेज तैयार कर इंदौर कोर्ट में लगाए थे। एक दस्तावेज में बरी होने और दूसरे में दोनों पक्षों के बीच समझौते की बात कही गई थी। जिस जज का नाम इस्तेमाल किया गया था, उन्होंने ही एमजी रोड थाने में इसकी शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने 2021 में उन्हें गिरफ्तार किया था। मामले में पुलिस ने कोर्ट में चालान पेश कर दिया है और मामला विचाराधीन है। 2016 में भी संतोष वर्मा पर इंदौर के लसूड़िया थाने में एक महिला ने केस दर्ज कराया था।
राज्यसभा में उछल फर्जी जाति प्रमाण पत्रों का मुद्दा
0 सांसद सोलंकी ने कहा-सख्त कार्रवाई की जाए
हाल ही में राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा-गलत तरीके से बनवाए गए ये कागज अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के असली हकदारों का अधिकार छीन रहे हैं। दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सांसद ने दावा किया कि मप्र में 600 क्लास-1 अफसरों के जाति प्रमाण पत्र संदेह के घेरे में बताए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश का जिक्र करते हुए सांसद ने बताया कि जाली प्रमाण पत्रों से नौकरी पाने के 232 मामलों की जांच चल रही है, जबकि 8000 से ज्यादा मामले पिछले 20 सालों से समितियों के पास अटके हैं।
घेरे में 600 क्लास वन अफसरों की जाति
मध्य प्रदेश में जाति प्रमाण पत्रों की बात करें तो यह बात सामने आई है कि प्रदेश के 3000 क्लास वन आॅफिसरों में से 600 की जाति संदेह के घेरे में हैं। सबसे ज्यादा 168 जाति प्रमाण-पत्र लोक निर्माण विभाग के अफसरों के हैं। यदि छोटे-बड़े पद जोड़ लिए जाएं तो ऐसे 8000 मामले प्रदेश सरकार की छानबीन समिति के पास जांच के दायरे में हैं। 600 मामले पिछले 15 साल से छानबीन समिति के पास हैं। इनमें से तीन का ही निपटारा हुआ है, बाकी अभी भी जांच के दायरे में हैं।
ओबीसी से छात्रवृत्ति, नौकरी में बने आदिवासी
मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण-पत्र घोटाले की परतें खुलने लगी हैं। ओबीसी वर्ग से आने वाले कई अधिकारी-कर्मचारियों ने पहले अन्य पिछड़ा वर्ग के दस्तावेज के आधार पर छात्रवृत्ति हासिल की और पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के समय अनुसूचित जनजाति का फर्जी प्रमाण-पत्र बनवा लिया। इन फर्जी प्रमाण-पत्रों की मदद से उन्होंने न सिर्फ सरकारी नौकरियां हासिल कीं, बल्कि उन पदों पर कब्जा कर लिया, जो आदिवासी वर्ग के युवाओं के लिए सुरक्षित थे। एसटीएफ ने प्रदेशभर में ऐसे 25 अधिकारी-कर्मचारियों की पहचान कर एफआईआर दर्ज की है। अब जांच एजेंसी की नजर उन 8 अधिकारियों पर है, जिन्होंने इन दस्तावेजों को बनाने व सत्यापित करने में भूमिका निभाई।
फर्जी जाति प्रमाण-पत्र से बने डॉक्टर
मध्य प्रदेश में आदिवासी होने के फर्जी जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर बड़े पैमाने पर लोगों ने नौकरी हासिल की। ग्वालियर के आरटीआई कार्यकर्ता गौरी शंकर ने एसटीएफ को अहम दस्तावेज सौंपा है। उन्होंने मप्र के 50 अधिकारी और कर्मचारियों की लिस्ट दी है। साथ ही दावा किया है कि भोपाल मेडिकल कॉलेज में फर्जी जाति प्रमाणपत्र पर लोग डॉक्टर बन गए है। कई लोग फर्जी प्रमाण-पत्र के जरिए नर्मदापुरम, भोपाल, ग्वालियर, रीवा, बैतूल सहित अन्य जिलों में नौकरियां कर रहे हैं। ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल में भी तीन डॉक्टर और एक इंजीनियर फर्जी आदिवासी प्रमाण पत्र पर नौकरी कर रहे हैं। इन सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
किस पद के कितने अधिकारियों पर जांच
जिनके खिलाफ एसटीएफ जांच कर रही है, इनमें 4 डॉक्टर, 1 आयुष अधिकारी, 1 इंजीनियर, 1 जीएम, एक संयुक्त संचालक, एक सूबेदार, 1 उपनिरीक्षक, 4 आरक्षक, 3 न्यायालय के स्टेनो, 1 फार्मासिस्ट और 8 शिक्षक हैं, जो प्रदेश के ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, दमोह, बैतूल, भोपाल, श्योपुर और राजगढ़ जिलों में पदस्थ हैं।
मध्यप्रदेश में आरक्षण की स्थिति
मध्यप्रदेश में वर्तमान आरक्षण नीति के तहत ओबीसी को 27 फीसदी (न्यायालयीन विवाद के अधीन),एससी को 16 फीसदी, एसटी को 20 फीसदी और ईडब्ल्यूएस को 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के निदेर्शानुसार जबलपुर हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है। दरअसल, ओबीसी को 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का कानून है, लेकिन जबलपुर उच्च न्यायालय के 4 मई 2022 के अंतरिम आदेश के बाद से कई मामलों में इसे 14 फीसदी तक सीमित रखा गया है। वर्तमान में कुल आरक्षण 50 फीसदी की सीमा को पार कर रहा है, जो कानूनी विवाद का कारण है।
इसलिए मामले दशकों तक नहीं सुलझे
कहा जाता है कि समस्या का कुछ हिस्सा पुराने नियमों से उपजा है। 1962 में, राजपत्रित अधिकारियों, तहसीलदारों और वन रक्षकों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अधिकृत किया गया था। 1975 में मंत्रियों को भी यह शक्ति दी गई थी। 1987 में, कलेक्टरों, अतिरिक्त कलेक्टरों, एसडीओ और नगर मजिस्ट्रेटों सहित अतिरिक्त अधिकारियों को प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए अधिकृत किया गया था। चूंकि कई अलग-अलग अधिकारियों के पास प्रमाण-पत्र जारी करने की शक्ति थी, इसलिए अभिलेखों को केंद्रीकृत तरीके से नहीं रखा जाता था। 1996 से पहले, कोई मानकीकृत आवेदन प्रारूप या अभिलेख-रखरखाव प्रणाली नहीं थी, जिसके कारण आज पुराने जाति प्रमाण पत्रों का सत्यापन करना बेहद मुश्किल हो गया है।
1950 का नियम बड़ा पेच
मप्र में जाति आरक्षण के ज्यादातर मामलों में संदेह की एक बड़ी वजह है। आरक्षण नियमों में प्रावधान है कि 1950 के अभिलेखों में जो जातियां मप्र में अनुसूचित जनजाति और जनजाति में पाई गईं, उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा। इसके बाद कोई भी व्यक्ति मध्यप्रदेश में आकर निवास करता है, उसे अजा-जजा आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
एम्सपर्ट व्यू....
दोषी का केवल चुनाव रद्द होना पर्याप्त नहीं
विधायक और सांसद के फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले में अदालतों का रुख अत्यंत सख्त रहा है। यह केवल चुनाव रद्द होने का मामला नहीं, बल्कि एक गंभीर आपराधिक भी कृत्य है। यदि दस्तावेज ही जाली है और उसको असली के रूप में सदोष लाभ अर्जित करने के आशय से उपयोग किया जाता है, तो यह सीधे तौर पर धोखाधड़ी (आईपीसी-420, 467, 468, 471) का केस बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि प्राथमिक साक्ष्य जाली प्रमाण पत्र की ओर इशारा करते हैं, तो हाईकोर्ट को चुनाव याचिका को समय से पहले रद्द नहीं करना चाहिए, बल्कि ट्रायल कोर्ट को कानूनी कार्रवाई जारी रखने का आदेश देना चाहिए। यदि जाति प्रमाण पत्र को उच्चाधिकार जांच समिति अवैध घोषित कर देती है, तो विधायक/सांसद को आरक्षित सीट पर बने रहने का अधिकार नहीं रहता। केवल चुनाव रद्द होना पर्याप्त नहीं है, दोषी जन प्रतिनिधि को धोखाधड़ी, साजिश और जाली दस्तावेज इस्तेमाल करने के लिए जेल भी हो सकती है।
पुष्पेंद्र दुबे, एडवोकेट, हाईकोर्ट, जबलपुर
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) विश्वभूषण मिश्र ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो अब मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर और 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ के लिए भी मार्गदर्शक बनने जा रहा है।
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