गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद के खात्मे के लिए 31 मार्च की डेडलाइन पर चर्चा की। उन्होंने छत्तीसगढ़ की पूर्व कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा और 2014 के बाद हुए विकास कार्यों का विवरण दिया।
By: Star News
Mar 30, 20267:15 PM
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
देश से नक्सलवाद को जड़ से मिटाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की समयसीमा अब बेहद करीब है। इस महत्वपूर्ण पड़ाव से ठीक पहले लोकसभा में नियम 193 के तहत नक्सलवाद के मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई। चर्चा की शुरुआत शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे ने की, जिसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार का पक्ष रखते हुए कड़ा रुख अपनाया।
गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को संबोधित करते हुए तीन मुख्य तिथियों का उल्लेख किया...
20 अगस्त 2019: गृह मंत्रालय में पहली रणनीतिक बैठक हुई, जहाँ नक्सलियों के खिलाफ 'ऑल एजेंसी अप्रोच' और खुफिया तंत्र को मजबूत करने का खाका तैयार हुआ।
24 अगस्त 2024: सरकार ने आधिकारिक घोषणा की कि 31 मार्च 2026 तक देश नक्सल मुक्त होगा।
31 मार्च 2026: नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे की अंतिम समयसीमा (डेडलाइन)।
अमित शाह ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के शासनकाल के दौरान नक्सलियों को संरक्षण मिला, जिसके कारण अभियान में देरी हुई। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि यदि विपक्ष प्रमाण चाहता है, तो वे उसे भी प्रस्तुत करने को तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 2023 में राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद अभियान ने तेज रफ्तार पकड़ी है।
गृह मंत्री ने बताया कि मोदी सरकार ने केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विकास से नक्सलवाद को चोट पहुँचाई है:
सड़कें: 17,589 किमी सड़कों की मंजूरी, जिसमें से 12,000 किमी बनकर तैयार हैं।
कनेक्टिविटी: 5,000 मोबाइल टावर लग चुके हैं और 8,000 नए 4G टावर लगाने का आदेश दिया गया है।
बैंकिंग और डाक: प्रभावित क्षेत्रों में 1,804 बैंक शाखाएं और 6,025 डाकघर खोले गए हैं।
शिक्षा: 259 एकलव्य विद्यालय और कई कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं।
"हमने नक्सलियों से बातचीत नहीं की, बल्कि उन्हें समाप्त कर वहां विकास की लहर पहुँचाई है। जो हथियार छोड़ना चाहते हैं, उनके लिए पुनर्वास की नीति तैयार है।" — अमित शाह
शाह ने नक्सलवाद के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए इसे विदेशी विचारधारा (रूस और चीन) से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि 1969 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन केवल रक्तपात का पर्याय है। उन्होंने मानवाधिकार के नाम पर नक्सलियों की वकालत करने वालों को भी आड़े हाथों लिया और कहा कि असली मानवता उन शहीद जवानों और आदिवासियों के साथ है, जिनका नक्सलियों ने शोषण किया।