हरियाली तीज व्रत और पूजा की संपूर्ण विधि विस्तार से जानिए। सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं के वर प्राप्ति के इस पर्व के नियम, कथा और महत्व के बारे में पंडित जी से समझें।

धर्म डेस्क। स्टार समाचार वेब
हरियाली तीज का यह पवित्र पावन पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक है और कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहा वर पाने का उत्तम अवसर है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की अराधना की जाती है। आइए, एक प्रकांड पंडित की भांति आपको हरियाली तीज की सरल, विधिवत और शास्त्रसम्मत पूजा पद्धति विस्तार से समझाते हैं।
निर्जला व्रत का विधान: हरियाली तीज का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। इस दिन महिलाएं अन्न तो दूर, जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं। यह व्रत करवा चौथ से भी अधिक कठोर माना गया है।
व्रत का संकल्प और श्रृंगार: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-आदि से निवृत्त होकर महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र और आरोग्यता का संकल्प लेती हैं। इसके पश्चात सोलह श्रृंगार करके माता गौरा की चौकी सजाई जाती है।
षोडशोपचार पूजन: इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की षोडशोपचार (16 प्रकार की पूजन सामग्री से) विधि-विधान से पूजा की जाती है।
समर्पण सामग्री: पूजा में हल्दी, कुमकुम, मेहंदी, गंध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य, फूलों की माला और पान के पत्ते जैसी समस्त पूजन सामग्री दोनों देवताओं को श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।
आरती और स्तुति: सामग्री अर्पण करने के उपरांत माता पार्वती और महादेव की दिव्य आरती उतारी जाती है।
संध्याकालीन कथा श्रवण: पूरे दिन निर्जला रहने के बाद, शाम के समय महिलाएं एकत्र होकर हरियाली तीज की व्रत कथा सुनती हैं। कथा के समापन पर माता गौरी से अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र की प्रार्थना की जाती है।
लोकगीत और उत्सव: पूजा और कथा के पश्चात घर में उत्सव का माहौल बनता है। महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, भजन-कीर्तन करती हैं और हर्षोल्लास के साथ झूला झूलती हैं।
व्रत का पारण: यह व्रत अगले दिन यानी चतुर्थी तिथि को सूर्योदय के पश्चात स्नान और पूजन संपन्न करने के बाद ही खोला जाता है। इसके बाद ही अन्न और जल ग्रहण किया जाता है।
सिंधारा (मायके से उपहार): इस पावन पर्व पर सुहागिनों के मायके से श्रृंगार का सामान (सिंधारा), वस्त्र और मिठाइयां उनकी ससुराल भेजी जाती हैं।
सौभाग्य के प्रतीक वस्त्र और श्रृंगार: इस दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करने की विशेष परंपरा है। हरी चुनरी, हरा लहरिया, हाथों में मेहंदी रचाना और सुहाग का संपूर्ण श्रृंगार करना बहुत शुभ माना जाता है।
सांस्कृतिक उल्लास: यदि हरा लहरिया उपलब्ध न हो, तो महिलाएं लाल या गुलाबी चुनरी में भी सज-धज सकती हैं। इस दिन जगह-जगह झूले पड़ते हैं, मेले लगते हैं और माता पार्वती की भव्य सवारी धूमधाम से निकाली जाती है।
हरियाली तीज व्रत और पूजा की संपूर्ण विधि विस्तार से जानिए। सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं के वर प्राप्ति के इस पर्व के नियम, कथा और महत्व के बारे में पंडित जी से समझें।
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