दीपोत्सव, यानी 'दीपों का उत्सव' या 'दीपों की पंक्ति', भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो प्रकाश की विजय, ज्ञान के उदय और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह मूल रूप से दीपावली पर्व का ही विस्तृत और भव्य रूप है

प्रकाश का पर्व
स्टार समाचार वेब. फीचर डेस्क
दीपोत्सव, यानी 'दीपों का उत्सव' या 'दीपों की पंक्ति', भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो प्रकाश की विजय, ज्ञान के उदय और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह मूल रूप से दीपावली पर्व का ही विस्तृत और भव्य रूप है, जिसे विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भगवान श्री राम के घर वापसी के उपलक्ष्य में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।
दीपोत्सव की परंपरा सदियों पुरानी है और इसके केंद्र में कई महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएँ हैं:
भगवान राम की अयोध्या वापसी: सबसे प्रमुख मान्यता के अनुसार, यह पर्व त्रेता युग में भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास और रावण पर विजय प्राप्त कर माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा का स्वागत घी के दीयों की कतारें जलाकर किया था, जिससे पूरी नगरी जगमगा उठी थी। यह परंपरा ही दीपोत्सव का आधार बनी।
अज्ञान पर ज्ञान की विजय: दीपोत्सव का आध्यात्मिक महत्व भी गहरा है। दीपक का प्रकाश ज्ञान, शुभता और धर्म का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अंधकार अज्ञान, बुराई और पाप का प्रतीक है। दीप जलाना जीवन से नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता और समृद्धि को आमंत्रित करने का भाव दर्शाता है।
दीपोत्सव एक दिन का नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जिसकी परंपराएँ इसे अद्वितीय बनाती हैं:
विशाल दीप प्रज्ज्वलन (Deepotsav): इस उत्सव का मुख्य आकर्षण लाखों दीयों को एक साथ जलाना होता है। अयोध्या में सरयू नदी के तट पर स्थित घाटों (राम की पैड़ी) पर लाखों मिट्टी के दीये जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने की परंपरा स्थापित हो चुकी है। यह दृश्य बेहद भव्य और अलौकिक होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और रामलीला: इस दौरान जगह-जगह रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें भगवान राम के जीवन और रामायण के प्रसंगों को दर्शाया जाता है। भव्य शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं, जिनमें भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान के स्वरूप सजे हुए कलाकार शामिल होते हैं।
सरयू आरती: सरयू नदी के तट पर होने वाली महाआरती एक प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान है, जहाँ हजारों भक्त और पर्यटक एकत्रित होते हैं। दीयों की रोशनी में नदी का दृश्य अत्यंत दिव्य हो जाता है।
तकनीकी नवाचार: आधुनिक दीपोत्सव में अब तकनीक का भी सुंदर समावेश देखने को मिलता है। इसमें थीमैटिक प्रोजेक्शन मैपिंग शो, लेज़र शो और ड्रोन शो शामिल होते हैं, जो परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।
मिट्टी के दीयों का महत्व: इस पर्व में स्थानीय कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों (दीयों) का विशेष महत्व होता है, जो स्थानीय शिल्प और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।
अयोध्या का दीपोत्सव अब केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं रहा है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का संगम बन चुका है। यह उत्सव न केवल आध्यात्मिकता और भक्ति का केंद्र है, बल्कि यह पर्यटन को बढ़ावा देता है, स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को मंच प्रदान करता है, और वैश्विक पटल पर भारत की सभ्यता और संस्कृति को स्थापित करता है।
यह भव्य आयोजन हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करता है और 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) के शाश्वत संदेश को विश्व भर में प्रसारित करता है।
भोपाल के खेड़ापति हनुमान मंदिर, इंदौर के पितरेश्वर और रणजीत हनुमान, उज्जैन के गेबी हनुमान, जबलपुर के अर्जी वाले हनुमान और ग्वालियर के मंशापूर्ण हनुमान मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। जगह-जगह शोभायात्राएं, भंडारे और धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं।
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