पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में पानी-पानी होना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत ने पाकिस्तान को एक बार फिर आड़े हाथों लेते हुए आईना दिखाया। भारत के स्थाई प्रतिनिधि पर्वतननेनी हरीश ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को सपोर्ट करने और अपनी अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने पर फटकार लगाई।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में पानी-पानी होना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत ने पाकिस्तान को एक बार फिर आड़े हाथों लेते हुए आईना दिखाया। भारत के स्थाई प्रतिनिधि पर्वतननेनी हरीश ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को सपोर्ट करने और अपनी अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने पर फटकार लगाई। शांति और बहुपक्षवाद पर एक उच्चस्तरीय डिबेट में हिस्सा लेते हुए भारत ने पाकिस्तान को आईएमएफ से बार-बार कर्ज लेने वाला देश और कट्टरता एवं आतंकवाद में डूबा हुआ राष्ट्र करार दिया। उन्होंने कहा कि एक तरफ भारत का परिपक्व लोकतंत्र, उभरती अर्थव्यवस्था और समावेशी समाज है। दूसरी तरफ पाकिस्तान कट्टरता और आतंकवाद में डूबा हुआ है, जो आईएमएफ के कर्ज पर चल रहा है। वह बार-बार आईएमएफ से कर्ज लेता है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि और राजदूत पार्वथानेनी हरीश ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उन्होंने पाकिस्तान को दो टूक जवाब दिया और कहा, देश की संप्रभुता पर सवाल उठाने के किसी भी प्रयास को भारत कभी स्वीकार नहीं करेगा। कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीय करण और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) का जिक्र करने के पाकिस्तान के दुस्साहस का कड़ा विरोध करते हुए पी हरीश ने कहा, आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय शांति के मुद्दों पर पाकिस्तान का दोहरा चरित्र निंदनीय है।
हरीश के जवाब से पहले पाकिस्तानी उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कश्मीर को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने पाकिस्तान को जवाब उस मंच पर दिया, जहां बहुपक्षवाद और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के विषय पर चर्चा की जा रही थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इस उच्च स्तरीय खुली बहस में हरीश ने लगभग पांच मिनट के अपने वक्तव्य में भारीय कूटनीति को स्पष्ट करते हुए पाकिस्तान को आइना दिखाया।
हरीश ने कहा, यह एक अहम चर्चा है। जब संयुक्त राष्ट्र के 80 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तो यह इस पर विचार करने का एक अच्छा समय है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बताए गए बहुपक्षवाद और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के विचार को अब तक कितना हासिल किया जा सका है। साथ ही, यह भी समझने का समय है कि इस रास्ते में क्या-क्या रुकावटें आईं। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद के पहले चालीस वर्षों में उपनिवेशवाद का अंत हुआ और शीत युद्ध का दौर चला। उस समय संघर्षों को काफी हद तक रोका और संभाला जा सका। इन कोशिशों में संयुक्त राष्ट्र की अहम भूमिका रही। वास्तव में, साल 1988 में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना को नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया था। शीत युद्ध के अंत के बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के नए संघर्ष शुरू हो गए। इसी के साथ संयुक्त राष्ट्र की शांति बनाए रखने वाली गतिविधियों का तरीका भी बदलने लगा।
पिछले कुछ दशकों में संघर्षों का स्वरूप भी बदल गया है। अब सरकार से नॉन-स्टेट एक्टर्स की बढ़ती संख्या सामने आई है, जिन्हें कई बार कुछ देश समर्थन देकर अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही आधुनिक डिजिटल और संचार तकनीकों की मदद से सीमा के आर-पार पैसा, हथियार, आतंकवादियों का प्रशिक्षण और चरमपंथी विचारधारा और तेजी से फैल रहे हैं। उन्होंने कहा, संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों का भविष्य क्या होगा-इस पर गंभीर चर्चा हो रही है। साथ ही, शांति स्थापित करने की प्रक्रिया अब और भी ज्यादा महत्व पाने लगी है। क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका भी इस दिशा में बढ़ी है। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी संघ ने अपने सदस्य देशों के बीच के विवादों को सुलझाने में सही ढंग से भागीदारी निभाई है।
शांति से विवादों को सुलझाने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय छह की शुरुआत इस बात को मान्यता देने से होती है कि किसी भी विवाद को सबसे पहले उसी में शामिल पक्षों को आपसी बातचीत और अपने चुने हुए शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाना चाहिए। किसी भी संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान तभी संभव है, जब उसमें शामिल देशों की सहमति और उनका सक्रिय योगदान हो। अगर कोई देश अच्छे पड़ोसी संबंधों और अंतरराष्ट्रीय नियमों की भावना का उल्लंघन करता है, तो उसे इसकी गंभीर कीमत चुकानी चाहिए।
पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, परिषद का कोई सदस्य अगर दूसरों को उपदेश दे, लेकिन खुद ऐसे काम करे जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए अस्वीकार्य हों तो उसे उचित नहीं कहा जा सकता। अंत में मैं यह कहना चाहता हूं कि भारत हमेशा की तरह बहुपक्षवाद और शांतिपूर्ण तरीकों से विवादों के समाधान के जरिए अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। यह पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान ने कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की कोशिश की है। लेकिन इन प्रयासों को ज्यादा समर्थन नहीं मिला है। ज्यादातर वैश्विक शक्तियां इसे भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मामला मानती हैं। भारत की शांत, लेकिन मजबूत प्रतिक्रिया ने एक जिम्मेदार लोकतंत्र और वैश्विक शांति के प्रति प्रतिबद्ध देश के रूप में उसकी छवि को और मजबूत किया है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति एक बार फिर केवल ध्यान भटकाने वाली रणनीति अपनाने वाले देश के रूप में सामने आई है।


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