श्रावण-भाद्रपद मास में निकलने वाली भगवान महाकाल की पारंपरिक सवारियां इस बार अभूतपूर्व सांस्कृतिक वैभव और भव्यता की साक्षी बनेंगी। अवंतिकानाथ के इस नगर भ्रमण में देश भर के ख्यातनाम बैंड अपनी सुरीली प्रस्तुतियों से राजाधिराज के राजसी वैभव को चार चांद लगाएंगे।

पारंपरिक सवारियां बनेंगी भव्यता की साक्षी
अवंतिकानाथ की सवारी में जुड़ेंगे लोक संस्कृति के रंग
झांकी-चलित प्रस्तुतियों से देश के कलाकार मोहेंगे मन
पांच किमी लंबे सवारी मार्ग पर दिखेगा श्रद्धा का सैलाब
तीन अगस्त-2026 से शुरू होगा सवारियों का सिलसिला

उज्जैन। स्टार समाचार वेब
श्रावण-भाद्रपद मास में निकलने वाली भगवान महाकाल की पारंपरिक सवारियां इस बार अभूतपूर्व सांस्कृतिक वैभव और भव्यता की साक्षी बनेंगी। अवंतिकानाथ के इस नगर भ्रमण में देश भर के ख्यातनाम बैंड अपनी सुरीली प्रस्तुतियों से राजाधिराज के राजसी वैभव को चार चांद लगाएंगे। खास बात यह है कि इस वर्ष की सवारियों को वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ की लाइव टेस्टिंग के रूप में देखा जा रहा है। आस्था के इस महापर्व में देश के विभिन्न राज्यों के लोक कलाकार न केवल चलित प्रस्तुतियां देंगे, बल्कि उन राज्यों की सांस्कृतिक विरासत को दशार्ती जीवंत झांकियां भी श्रद्धालुओं का मन मोहेंगी। पांच किमी लंबे पारंपरिक मार्ग पर निकलने वाली इन सवारियों में सदियों पुरानी परंपरा के साथ आधुनिक प्रबंधन और देश की बहुरंगी संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलेगा।
भ्रमण पर निकलते हैं भगवान
गौरतलब है कि महाकाल मंदिर की परंपरा में भगवान महाकाल की पूजा राजा के रूप में होती है। श्रावण-भाद्रपद मास में अवंतिकानाथ रजत पालकी में सवार होकर अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं। प्रजा भी अपने राजा के स्वागत में पलक-पावड़े बिछाती है। पारंपरिक सवारी मार्ग पर चार घंटे तक श्रद्धा और भक्ति का उल्लास छाया रहता है।
आदिवासी सांस्कृतिक समूहों को जोड़ा
सदियों पुरानी इस परंपरा में बैंड-बाजे, पुलिस का अश्वारोही दस्ता, पुलिस बैंड, भजन मंडलियां और शहर के प्रबुद्धजन शामिल होते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में सवारी की गरिमा और सांस्कृतिक वैभव को बढ़ाने के लिए पारंपरिक भजन मंडलियों, झांझ-डमरू दलों के साथ जनजातीय सांस्कृतिक समूहों को भी जोड़ा गया है। इस बार आयोजन को और अधिक भव्य स्वरूप देने की तैयारी है।
पारंपरिक कला का करेंगे प्रदर्शन
विभिन्न राज्यों के लोक नृत्य दल सवारी के साथ चलते हुए अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन करेंगे। विशेष बात यह रहेगी कि जिस राज्य का लोक दल प्रस्तुति देगा, उसी राज्य की सांस्कृतिक पहचान और लोक विरासत को दशार्ती झांकी भी उसके साथ चलेगी। इससे श्रद्धालुओं को भगवान महाकाल की सवारी में देश की विविध लोक परंपराओं की जीवंत झलक देखने का अवसर मिलेगा।
यह रहेगा बाबा महाकाल का सवारी मार्ग
महाकाल मंदिर से कोट मोहल्ला, गुदरी चौराहा, बक्षी बाजार, कहारवाड़ी होते हुए मोक्षदायिनी शिप्रा के रामघाट पहुंचेगी। यहां पूजन के पश्चात सवारी रामानुजकोट, मोढ़ की धर्मशाला, कार्तिक चौक, सत्यनारायण मंदिर, ढाबा रोड, टंकी चौराहा, गोपाल मंदिर, पटनी बाजार होते हुए शाम 7 बजे पुन: मंदिर पहुंचकर संपन्न होगी।
महाकालेश्वर की 6 सवारी निकलेगी
03 अगस्त : श्रावण मास की पहली सवारी
10 अगस्त : श्रावण मास की दूसरी सवारी
17 अगस्त : श्रावण मास की तीसरी सवारी
24 अगस्त : श्रावण मास की चौथी सवारी
31 अगस्त : भाद्रपद मास की पहली सवारी
07 सितंबर : श्रावण-भाद्रपद मास की राजसी सवारी


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