TMC ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राज्यसभा में महाभियोग नोटिस दिया है। जानें क्या हैं आरोप और क्या है CEC को हटाने का संवैधानिक नियम।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने उनके खिलाफ एक बार फिर महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) लाने के लिए राज्यसभा सचिवालय में नोटिस दिया है। इस नए नोटिस पर कुल 73 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें ज्ञानेश कुमार पर 9 गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
यह पहली बार नहीं है जब CEC के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की मांग उठी है। इससे पहले भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में नोटिस दिया था। पिछले नोटिस से ताजा नोटिस के अंदर की बात करें तो पिछले नोटिस पर लगभग 200 सांसदों (लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 से अधिक) ने हस्ताक्षर किए थे। 10 पन्नों से अधिक के उस नोटिस में बिहार की SIR प्रक्रिया, निष्पक्षता का अभाव और कुछ राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपात जैसे 7 मुख्य बिंदुओं का जिक्र था। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए CEC की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रस्तावक की मुख्य सूत्रधार मानी जा रही हैं। उनके इस कदम को कांग्रेस सहित 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के तमाम दलों और आम आदमी पार्टी (AAP) का भी समर्थन प्राप्त है। सांसदों का आरोप है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता खतरे में है, जिसके कारण संवैधानिक कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।
भारतीय संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना आसान नहीं है। इसके लिए एक निश्चित प्रक्रिया का पालन करना होता है। चलिए जानते हैं क्या है प्रक्रिया। महाभियोग का नोटिस देने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। नोटिस मिलने के बाद सदन के अध्यक्ष (स्पीकर या सभापति) इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। यदि स्वीकार होता है, तो आरोपों की जांच के लिए समिति बनाई जाती है। संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना अनिवार्य है।

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