ग्वालियर के सिंधिया राजघराने का दशकों पुराना संपत्ति विवाद सुलझने की राह पर है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआओं के बीच अरबों रुपये की शाही विरासतों के बंटवारे पर अंतिम सहमति बनी। जानें क्या है समझौते का मूल मंत्र।

ग्वालियर। स्टार समाचार वेब
ग्वालियर के ऐतिहासिक सिंधिया राजघराने के बीच चल रहा अरबों रुपये की संपत्ति का विवाद अब अंतिम पड़ाव पर है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर जिला न्यायालय में एक समझौता आवेदन प्रस्तुत किया है, जो राजपरिवार के आपसी कलह को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पारिवारिक चर्चाओं के बाद तैयार हुए इस 'महा-समझौते' के तहत 'जो जहां काबिज, वो संपत्ति उसी की' के फॉर्मूले को आधार बनाया गया है।
राजघराने की अधिकांश बेशकीमती संपत्तियां सीधे किसी व्यक्ति के नाम न होकर 'सर जयाजीराव ट्रस्ट' और 'कृष्ण माधव ट्रस्ट' जैसी संस्थाओं के अधीन हैं। इस समझौते के लागू होने से दिल्ली, मुंबई, पुणे और ग्वालियर की अदालतों में वर्षों से लंबित एक दर्जन से अधिक मुकदमों का कानूनी पटाक्षेप हो जाएगा। समझौते में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनकी बुआएं—वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे, ऊषा राजे राणा तथा परिवार के अन्य सदस्य शामिल हैं।
इस समझौते का एक भावुक पहलू राजमाता विजयाराजे सिंधिया का प्रिय 'पन्ने का शिवलिंग' है। सूत्रों के अनुसार, यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर अब पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी जाएगी। हालांकि फाइल रिकॉर्ड रूम से न मिलने के कारण हाल ही में सुनवाई टल गई थी, लेकिन उम्मीद है कि अगले सप्ताह बुआओं की ओर से भी कोर्ट में आवेदन दाखिल होते ही इस ऐतिहासिक समझौते पर अंतिम मुहर लग जाएगी।

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