एमपी हाईकोर्ट के जस्टिस राम कुमार चौबे ने कहा कि अग्रिम जमानत विशेष परिस्थितियों के लिए है। पन्ना के अवैध शराब मामले में कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज की।

जबलपुर। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट के जस्टिस राम कुमार चौबे की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि जमानत देना पूरी तरह से अदालत का स्वविवेकाधिकार है, लेकिन अग्रिम जमानत की असाधारण शक्ति का उपयोग सामान्य प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि अत्यंत सावधानी और विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान माननीय अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों के मामलों में यदि आरोपी को अग्रिम जमानत या अंतरिम सुरक्षा प्रदान की जाती है, तो इससे पूरी न्याय प्रक्रिया पर विपरीत असर पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि जमानत से आरोपी को पहले ही संरक्षण मिलने से पुलिस जांच की गति प्रभावित हो सकती है। इस बात की प्रबल आशंका रहती है कि आरोपी बाहर रहकर सबूतों या गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास करे। अंतरिम राहत मिलने से कई बार मुख्य जांच का रुख भी भटक जाता है।
यह पूरा मामला पन्ना जिले के सिमरिया थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने यहाँ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत अवैध शराब तस्करी का एक मामला दर्ज किया था।
आरोपी की दलील: मामले के आरोपी बब्लू उर्फ रामपाल यादव ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि पुलिस ने उसके मवेशी शेड से 65 लीटर अवैध शराब बरामद की थी और मौके से उसके भतीजे अनुज यादव को गिरफ्तार किया था। भतीजे के बयान (मेमोरेंडम) के आधार पर बब्लू को भी इस केस में आरोपी बना दिया गया, जबकि उसका इससे सीधा संबंध नहीं है।
जस्टिस राम कुमार चौबे की एकलपीठ ने मामले के रिकॉर्ड और तथ्यों को देखने के बाद आरोपी बब्लू उर्फ रामपाल यादव की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से दो बातें कहीं:
स्वामित्व वाले स्थान से बरामदगी: रिकॉर्ड से यह साफ है कि भारी मात्रा में अवैध शराब आवेदक (बब्लू) के मालिकाना हक वाले मवेशी शेड से ही मिली थी। इसलिए यह कतई नहीं कहा जा सकता कि आरोपी के खिलाफ कोई सबूत या साक्ष्य नहीं है।
कानूनी रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आबकारी अधिनियम की धारा 59-ए, धारा 34(2) से जुड़े गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत देने पर स्पष्ट रोक लगाती है। ऐसे कड़े कानूनी प्रावधानों की मौजूदगी में आरोपी की एंटीसिपेटरी बेल अर्जी पर विचार करना कानून सम्मत (विधिसम्मत) नहीं होगा।

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