डिजिटल डेस्क। स्टार समाचार वेब

    पिछले कई दशकों से पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) अब अपने सेवाकाल के अंतिम पड़ाव पर है। नासा ने इस विशालकाय संरचना को सुरक्षित रूप से नीचे लाने और समुद्र में विसर्जित करने के लिए  कार्ययोजना तैयार की है।

    ISS को डीऑर्बिट करने की चरणबद्ध प्रक्रिया

    नासा के वर्तमान प्लान के अनुसार, इस प्रक्रिया को दो चरणों में पूरा किया जाएगा...

    1. नियंत्रित नीचे लाना: 2028 से 2029 के बीच, पृथ्वी के वायुमंडलीय खिंचाव (Atmospheric Drag) और रशियन सेगमेंट की मदद से ISS को धीरे-धीरे निचली कक्षा में लाया जाएगा।

    2. डीऑर्बिट व्हीकल का उपयोग: 2029 के मध्य में नासा स्पेसएक्स (SpaceX) द्वारा निर्मित 'U.S. डीऑर्बिट व्हीकल' को स्टेशन से जोड़ेगा। यह यान 46 ड्रैको थ्रस्टर्स के जरिए स्टेशन को प्रशांत महासागर की ओर धकेलेगा।

    3. पॉइंट निमो में विसर्जन: 2030 के अंत या 2031 की शुरुआत तक, ISS को पृथ्वी के सबसे दूरस्थ समुद्री हिस्से, जिसे 'पॉइंट निमो' (Point Nemo) कहा जाता है, में गिरा दिया जाएगा।

    समुद्री पर्यावरण के लिए चिंताएं

    पॉइंट निमो को इसलिए चुना गया है ताकि रिहायशी इलाकों को मलबे से बचाया जा सके। हालांकि, 'ओशन फाउंडेशन' जैसी संस्थाओं ने इस पर गंभीर चिंता जताई है...

    • मलबे का प्रभाव: ओशन फाउंडेशन के अध्यक्ष मार्क स्पाल्डिंग का तर्क है कि स्टेशन के सभी हिस्से वायुमंडल में जलकर नष्ट नहीं होंगे। कई मजबूत धातु के टुकड़े समुद्र की गहराई तक पहुंचेंगे, जिसका प्रभाव समुद्री जीव-जंतुओं पर पड़ सकता है।

    • अनिश्चितता का जोखिम: अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कौन से पदार्थ समुद्र में गिरेंगे और वे वहां के नाजुक इकोसिस्टम के लिए कितने हानिकारक हो सकते हैं।

    कानूनी पेच और वैश्विक चिंताएं

    इस मामले में एक बड़ी कानूनी खामी सामने आई है। 1972 का 'स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन' केवल ज़मीन पर गिरने वाले मलबे के लिए मुआवज़े का प्रावधान करता है, जबकि 'हाई सीज़' (खुले समुद्र) के लिए ऐसी कोई जवाबदेही तय नहीं है।

    हाल ही में हुए BBNJ एग्रीमेंट (हाई सीज़ ट्रीटी) के तहत यह अनिवार्य है कि किसी भी गतिविधि का समुद्री पर्यावरण पर प्रभाव (Environmental Impact Assessment) पहले जाँचा जाए। विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या इतिहास के इस सबसे बड़े 'रीएंट्री इवेंट' को भी इस अंतरराष्ट्रीय संधि के दायरे में लाया जाना चाहिए।