सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना को चुनौती देने वाली PIL को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए यह सरकार का नीतिगत फैसला है। जानिए पूरी रिपोर्ट।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट ने देश में जाति आधारित जनगणना कराने के केंद्र सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी है। अदालत ने इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जनगणना का स्वरूप कैसा हो और उसमें किन आंकड़ों को शामिल किया जाए, यह पूरी तरह से सरकार के नीतिगत दायरे (Policy Matter) में आता है। न्यायालय ने लोक कल्याण के लिए ऐसे आंकड़ों को बेहद महत्वपूर्ण माना है।
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि सरकार को समाज के पिछड़े वर्गों की सटीक आबादी और उनकी वास्तविक स्थिति का पता होना ही चाहिए। जब तक सरकार के पास पुख्ता आंकड़े नहीं होंगे, तब तक उन वर्गों के उत्थान के लिए सटीक और प्रभावी कल्याणकारी योजनाएं नहीं बनाई जा सकतीं। अदालत ने इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की विसंगति से इनकार किया।
यह याचिका सुधाकर गुमुला नामक व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने अदालत में खुद पेश होकर अपनी दलीलें रखीं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि सरकार के पास पहले से ही विभिन्न जातियों से संबंधित पर्याप्त डेटा और पुरानी जानकारियां उपलब्ध हैं, इसलिए नई जाति जनगणना की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इन दलीलों को पूरी तरह से अतार्किक पाते हुए अस्वीकार कर दिया और कहा कि नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
आगामी जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रही है। साल 2027 में होने वाली यह जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। साल 1931 के बाद यह पहला मौका होगा जब भारत में इतने विस्तृत पैमाने पर जातियों की गणना की जाएगी। इसके अलावा, तकनीकी रूप से भी यह एक बड़ा बदलाव होगी, क्योंकि यह भारत के इतिहास की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना (Digital Census) होगी, जिससे आंकड़ों को जुटाने और उनके विश्लेषण में सटीकता आएगी।

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