दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 47 लाख नाम गायब होने पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को घेरा। फॉर्म-6, 30 अक्तूबर की समयसीमा और मजदूरों के अधिकारों पर पूछे अहम सवाल।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) अभियान को लेकर निर्वाचन आयोग (Election Commission) के रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि महज समय पर फॉर्म जमा न कर पाने या अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहने के कारण किसी भी पात्र नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। याचिका में दावा किया गया है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लगभग 47 लाख मतदाताओं के नाम गायब हैं, जिसे अदालत ने बेहद चिंताजनक माना है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि जो लोग 2026 की मतदाता सूची में पहले से पंजीकृत थे, उन्हें सूची से नाम हटने के बाद फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है।
नियम क्या कहता है: फॉर्म-6 का उपयोग केवल पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों के लिए होता है (जिसमें यह शपथ देनी होती है कि व्यक्ति का नाम कहीं और दर्ज नहीं है)। वहीं, फॉर्म-8 का उपयोग पते या विवरण में बदलाव के लिए किया जाता है।
अदालत की टिप्पणी: यदि कोई मतदाता दिल्ली के भीतर ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित हुआ है, तो उससे यह घोषणा पत्र भरवाना पूरी तरह तर्कहीन है कि वह कभी मतदाता था ही नहीं। आयोग को इसके लिए स्पष्ट और व्यावहारिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि दिल्ली जैसे महानगर में मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी कामगार रोजगार की तलाश में अक्सर एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं।
अस्थायी अनुपस्थिति बनाम स्थायी प्रवास: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि काम के सिलसिले में यदि कोई व्यक्ति एक-दो महीने के लिए शहर से बाहर रहता है, तो उसे 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' (Permanently Shifted) मानकर सूची से हटाना सही नहीं है।
आयोग की जिम्मेदारी: पूरी जिम्मेदारी आम नागरिकों या कामगारों पर डालने के बजाय चुनाव आयोग के तंत्र को खुद यह सत्यापन करना चाहिए कि कौन व्यक्ति स्थायी रूप से गया है और कौन अस्थायी रूप से बाहर है।
सुप्रीम कोर्ट ने गणना फॉर्म जमा करने की समयसीमा (30 अक्तूबर) पर भी आयोग को विचार करने को कहा है।
कोर्ट का सवाल: जब दिल्ली में हाल-फिलहाल में कोई चुनाव प्रस्तावित नहीं हैं, तो प्रक्रिया को पूरा करने में इतनी जल्दबाजी और कठोर समयसीमा का औचित्य क्या है?
अधिकारों की सुरक्षा: अदालत ने चेतावनी दी कि समयसीमा चूक जाने के कारण किसी नागरिक का वोट देने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार हमेशा के लिए खत्म नहीं होना चाहिए।
आयोग का पक्ष: चुनाव आयोग ने पीठ को बताया कि उसने जगह-जगह शिविर लगाए हैं, बीएलओ (BLO) को तैनात किया है और घर-घर जाकर डेटा एकत्र किया जा रहा है। आयोग जरूरत पड़ने पर 30 अक्तूबर की समयसीमा आगे बढ़ाने पर सकारात्मक विचार करने के लिए सहमत हुआ है।
पीठ ने निर्देश दिया कि जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से छूटे हैं, उनकी जानकारी और सूची आसानी से सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सरल भाषा में जानकारी: आयोग छूटे हुए लोगों के पुराने रिकॉर्ड की जानकारी बेहद सरल हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराए, ताकि आम नागरिक समझ सकें कि फॉर्म जमा न करने का उन पर क्या असर पड़ेगा।
फॉर्म न मिलने वालों का क्या? कोर्ट ने आयोग से विशेष रूप से पूछा कि जिन लोगों तक बीएलओ या गणना फॉर्म पहुँचे ही नहीं, उनके लिए आयोग की व्यवस्था में क्या राहत का प्रावधान है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि बिहार SIR मामले में दिए गए पहले के फैसले में 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' (तार्किक विसंगति) की श्रेणी की वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया गया था और यह कानूनी सवाल अभी भी खुला है।
व्यापक जांच की जरूरत: पीठ ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग 2003 की संदर्भ मतदाता सूची में दर्ज नामों को इतने बड़े पैमाने पर फिर से जांच के दायरे में किस आधार पर ला सकता है।
2 सप्ताह का अल्टीमेटम: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले की उचित जांच और अधिकारियों द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेना अनिवार्य है। अदालत ने आयोग को छूटे मतदाताओं, फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया और समयसीमा विस्तार पर विचार कर दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

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