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I-PAC Case: ममता सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट, ED की छापेमारी पर कानूनी टकराव तेज

पश्चिम बंगाल सरकार ने I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की। जानें क्या है प्रतीक जैन और ममता बनर्जी से जुड़ा यह पूरा विवाद और ED की अगली रणनीति।

By: Ajay Tiwari

Jan 10, 20266:46 PM

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I-PAC Case: ममता सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट, ED की छापेमारी पर कानूनी टकराव तेज

कोलकाता/दिल्ली: स्टार समाचार वेब

पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच कानूनी लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई है। आई-पैक (I-PAC) और उसके निदेशक प्रतीक जैन के ठिकानों पर हुई छापेमारी के बाद, ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है। इस कैविएट के माध्यम से राज्य सरकार ने अदालत से अनुरोध किया है कि ED की किसी भी संभावित याचिका पर राज्य का पक्ष सुने बिना कोई भी एकतरफा आदेश पारित न किया जाए।

क्या है पूरा I-PAC विवाद?

विवाद की शुरुआत तब हुई जब ED ने कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कोलकाता स्थित आई-पैक के ऑफिस और प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंच गईं, जिसे लेकर काफी बवाल हुआ। ED और टीएमसी (TMC) ने इस मामले में एक-दूसरे के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई है।

प्रमुख आरोप-प्रत्यारोप:

  • TMC का दावा: पार्टी का आरोप है कि ED का मकसद भ्रष्टाचार की जांच नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए तैयार की गई 'गोपनीय चुनावी रणनीति' और डेटा की चोरी करना है।

  • ममता बनर्जी का मार्च: मुख्यमंत्री ने इस कार्रवाई के विरोध में कोलकाता में 10 किलोमीटर लंबा पैदल मार्च निकाला और इसे अपनी पार्टी की रणनीति पर सीधा हमला करार दिया।

  • गृह मंत्रालय की सक्रियता: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस पूरे घटनाक्रम और CRPF के साथ हुए टकराव पर ED से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।


यह भी पढ़ें... 

कोलकाता... आई-पैक कार्यालय पर ईडी का छापा...  मौके पर पहुंचीं सीएम 


विवाद की टाइमलाइन:

  • गुरुवार: ED ने साल्ट लेक स्थित आई-पैक ऑफिस और प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं।

  • शुक्रवार: ममता बनर्जी ने कोलकाता की सड़कों पर विशाल विरोध मार्च निकाला।

  • शनिवार: बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की। गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट मांगी।


स्टार विशेष...


पश्चिम बंगाल में इन दिनों 'कोयला' और 'चुनावी रणनीति' (I-PAC) के बीच एक अजीबोगरीब कानूनी गुत्थी उलझ गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की आई-पैक के ठिकानों पर छापेमारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर एक राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म का नाम मनी लॉन्ड्रिंग और कोयला घोटाले में कैसे आया? आइए विस्तार से समझते हैं।

1. क्या है बंगाल का कोयला तस्करी मामला?

यह मामला मुख्य रूप से ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) की खदानों से अवैध रूप से कोयला निकालने और उसे ऊंचे दामों पर बेचने से जुड़ा है। सीबीआई और ईडी का आरोप है कि इस अवैध कारोबार से करोड़ों रुपये की कमाई की गई, जिसे शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) के जरिए 'सफेद' किया गया।

2. I-PAC पर ED की नजर क्यों?

ED के सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसी कुछ ऐसे वित्तीय लेन-देन (Financial Transactions) की जांच कर रही है, जो कथित तौर पर कोयला घोटाले के मुख्य आरोपियों और राजनीतिक सलाहकारों के बीच हुए थे।

  • मनी ट्रेल: जांच एजेंसी का संदेह है कि घोटाले का पैसा चुनावी कैंपेन और राजनीतिक विज्ञापनों में निवेश किया गया हो सकता है।

  • प्रतीक जैन की भूमिका: आई-पैक के निदेशक प्रतीक जैन के वित्तीय रिकॉर्ड्स की जांच के जरिए ED यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या फर्म को मिलने वाली फीस का स्रोत कहीं अवैध गतिविधियों से तो नहीं जुड़ा है।

3. 'रणनीति चोरी' बनाम 'जांच' का विवाद

जहाँ ED इसे शुद्ध रूप से भ्रष्टाचार की जांच बता रही है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी के आरोप कुछ और ही संकेत देते हैं:

  • डेटा गोपनीयता: आई-पैक के पास टीएमसी के आगामी चुनावों के लिए बूथ स्तर का डेटा, उम्मीदवारों का विश्लेषण और प्रचार की गुप्त योजनाएं हैं।

  • विपक्ष का तर्क: टीएमसी का कहना है कि कोयला घोटाला महज एक बहाना है, असली मकसद विपक्षी पार्टी की 'चुनावी ब्लूप्रिंट' तक पहुंच बनाना है ताकि उसे चुनाव से पहले कमजोर किया जा सके।

4. कानूनी चुनौतियां और आगे की राह

ममता सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट (Caveat) दाखिल कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वे इस मामले को हल्के में नहीं ले रही हैं।

  • एफआईआर का पेंच: टीएमसी ने दावा किया है कि छापेमारी के दौरान ईडी अधिकारियों ने मर्यादा तोड़ी, वहीं ईडी ने सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में पुलिस शिकायत की है।

  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: छापेमारी में जब्त किए गए मोबाइल और लैपटॉप अब जांच का केंद्र हैं। यदि अदालत इन साक्ष्यों के उपयोग पर रोक लगाती है, तो ED की जांच को बड़ा झटका लग सकता है।


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