तिब्बत की निर्वासित सरकार के पूर्व नेता लोबसांग सांगे ने दावा किया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को कई बार दिल का दौरा पड़ा है। जानिए क्या है पूरा मामला, 'सम्राट की दुविधा' और चीन के उत्तराधिकार संकट की पूरी कहानी।

चीन। स्टार समाचार वेब
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) के स्वास्थ्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। तिब्बत की निर्वासित सरकार (Central Tibetan Administration) के पूर्व नेता लोबसांग सांगे ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि शी जिनपिंग को कम से कम दो से तीन बार दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ चुका है। यह सनसनीखेज दावा उन्होंने हाल ही में एक पॉडकास्ट के दौरान किया। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद से ही चीनी लीडरशिप, शी के राजनीतिक भविष्य और देश की उत्तराधिकार योजनाओं पर बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। हालांकि, इन दावों की किसी भी स्वतंत्र या आधिकारिक मेडिकल स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस पर सुगबुगाहट तेज़ हो गई है।
मीडिया को दिए इंटरव्यू में लोबसांग सांगे ने बताया कि उन्हें यह अंदरूनी जानकारी चीन के एक वरिष्ठ पूर्व अधिकारी के साथ हुई लंबी चर्चा के दौरान मिली थी। सांगे के अनुसार, भारी राजनीतिक दबाव के कारण शी जिनपिंग की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर असर पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि शी "मेंटल फॉग" (मानसिक उलझन और स्पष्ट सोच में कमी) जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। सांगे ने शी के हालिया तौर-तरीकों, चलने-फिरने में बदलाव और चीनी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को अचानक हटाए जाने की घटनाओं को इसी सेहत से जोड़कर देखा है।
शी जिनपिंग की बिगड़ती सेहत के दावों को उस समय और हवा मिली जब चाइना डेमोक्रेसी पार्टी (CDP) के चेयरमैन वानजुन शी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। उनके मुताबिक, 30 अगस्त को जब शी जिनपिंग एक विशेष विमान से बिश्केक पहुंचे, तो उनके हाव-भाव काफी चिंताजनक थे। प्लेन की सीढ़ियों से उतरते समय वे काफी थके हुए, पीले और सूजे हुए नजर आए। उनके चलने में स्पष्ट लड़खड़ाहट थी और उन्हें अपनी पत्नी पेंग लियुआन के सहारे की आवश्यकता पड़ी। इन दृश्यों ने उन पुरानी अफवाहों को और बल दे दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि शी को हाल ही में स्ट्रोक आया था और उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा था।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू चीन का उत्तराधिकार संकट है। लोबसांग सांगे ने इसे "सम्राट की दुविधा" (Emperor's dilemma) का नाम दिया है। ऐतिहासिक रूप से एक सर्वशक्तिमान शासक के सामने यह बड़ी समस्या रहती है कि यदि वह आधिकारिक तौर पर अपना उत्तराधिकारी घोषित करता है, तो पार्टी के भीतर एक नया प्रतिद्वंद्वी खड़ा हो जाता है जो उसके अधिकार को चुनौती दे सकता है। वहीं, यदि वह उत्तराधिकारी नहीं चुनता है, तो उसके पद छोड़ने के बाद देश में सत्ता के लिए भयानक संघर्ष और अनिश्चितता पैदा हो सकती है। यही कारण माना जा रहा है कि शी जिनपिंग खुलकर अपना उत्तराधिकारी सामने लाने से बच रहे हैं।
लोबसांग सांगे ने 2011 से 2021 तक धर्मशाला (भारत) स्थित सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन के राजनीतिक प्रमुख (सिक्योंग) के रूप में कार्य किया है और वर्तमान में वह हार्वर्ड लॉ स्कूल से जुड़े हैं। चूंकि सांगे तिब्बत पर चीन की दमनकारी नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं, इसलिए उनके बयानों को एक राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के शीर्ष नेतृत्व में पारदर्शिता की कमी के कारण ऐसी अटकलें और दावे अक्सर ग्लोबल मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं, फिर भी जब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आता, इन्हें एक राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

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