भारत में फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाने वाली होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि नवजीवन, प्रकृति के पुनर्जागरण और सामाजिक समरसता का महापर्व है।

कमलाकर सिंह- पूर्व कुलपति, भोपाल
भारत में फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाने वाली होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि नवजीवन, प्रकृति के पुनर्जागरण और सामाजिक समरसता का महापर्व है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, तो रंगों का उत्सव मनुष्य के भीतर और समाज के बीच जमी दूरी को मिटाने का अवसर देता है। जल और रंग—दोनों शुद्धि, उल्लास और नए आरंभ के संकेत हैं। यही कारण है कि होली का यह भाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्व के अनेक देशों में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुआ है।
आज होली का वैश्विक स्वरूप केवल सांस्कृतिक समानताओं तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक देशों में बसे भारतीय समुदाय ने इस पर्व को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासी बड़े उत्साह के साथ होली मनाते हैं। मंदिरों, सांस्कृतिक संस्थाओं और खुले मैदानों में रंगोत्सव आयोजित होते हैं। अनेक स्थानों पर स्थानीय नागरिक भी इसमें सम्मिलित होते हैं और यह पर्व बहुसांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक बन जाता है।
न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी और कैलिफ़ोर्निया जैसे अमेरिकी राज्यों में सामूहिक होली उत्सव हजारों लोगों को आकर्षित करते हैं। लंदन और लीसेस्टर में भारतीय समुदाय रंगों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। सिडनी और मेलबर्न के विश्वविद्यालय परिसरों में होली युवाओं का विशेष आकर्षण बन चुकी है। खाड़ी देशों में भी सीमित परिस्थितियों के बावजूद भारतीय समाज अपनी परंपरा को सहेजे हुए है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में अप्रैल के महीने में जल के माध्यम से नववर्ष मनाने की परंपरा है। थाईलैंड का “सोंगक्रम”, म्यांमार का “थिंग्यान”, लाओस का “पाई माई” और कंबोडिया का “चौल छनम थमे” इन सभी में पानी के छींटों के साथ पुराने वर्ष की नकारात्मकताओं को विदा कर नए वर्ष का स्वागत किया जाता है। बुद्ध प्रतिमाओं का स्नान, बुज़ुर्गों का सम्मान और सामूहिक आनंद इन पर्वों की विशेषता है। जल यहाँ केवल खेल नहीं, बल्कि शुद्धि और समृद्धि की कामना का माध्यम है।
विश्व के अन्य भागों में भी जल और रंग से जुड़े उत्सव मिलते हैं। स्पेन के बुनोल नगर में “ला टोमाटिना” के दौरान लोग एक-दूसरे पर टमाटर फेंकते हैं। इटली के ईवेरिया नगर में “संतरों की लड़ाई” में संतरे की वर्षा का दृश्य प्रस्तुत करता है। दक्षिण कोरिया का “बोर्योंग मिट्टी महोत्सव” मिट्टी के साथ उल्लास का अनोखा रूप है, जबकि स्पेन के हारो नगर में “हारो वाइन महोत्सव” में अंगूरी रस के साथ सामूहिक आनंद मनाया जाता है। इन सभी उत्सवों में सहभागिता, उत्साह और प्रतीकात्मक शुद्धि का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।
इन आयोजनों में केवल रंग खेलना ही उद्देश्य नहीं होता। भारतीय संगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक व्यंजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ इस पर्व को जीवंत उत्सव में बदल देती हैं। कई देशों में होली को “वसंत उत्सव” या “रंग पर्व” के रूप में भी मान्यता मिलने लगी है। इससे भारतीय संस्कृति की सकारात्मक और उत्सवधर्मी छवि विश्व समुदाय के सामने आती है।
मध्यप्रदेश में होली की छटा विशेष उल्लेखनीय है। मालवा अंचल में रंगपंचमी तक रंगों की गूंज बनी रहती है। इंदौर, उज्जैन में रंगपंचमी का सार्वजनिक उत्साह देखने योग्य होता है। बघेलखंड और बुंदेलखंड में फाग गीतों की परंपरा लोकजीवन को स्पंदित करती है। आदिवासी अंचलों में भगोरिया हाट सामाजिक मेल-मिलाप और जीवन की नई शुरुआत का प्रतीक है। यहाँ होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की सशक्त अभिव्यक्ति है।
आज जब विश्व जल संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक दूरी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब जल और रंग के ये उत्सव हमें प्रकृति के महत्व और सामाजिक एकता का संदेश देते हैं। जल जीवन का आधार है और रंग जीवन का उत्साह।
होली से लेकर सोंगक्रान और ला टोमाटीना तक, और भारत से लेकर विश्व के महानगरों तकजल और रंग का यह उत्सव मानवता की साझा भावना को प्रकट करता है। यह बताता है कि संस्कृति सीमाओं से परे होती है। जहाँ-जहाँ भारतीय बसे हैं, वहाँ-वहाँ होली ने अपने रंग बिखेरे हैं। आज होली केवल भारत का त्योहार नहीं, बल्कि विश्व का उत्सव बन चुकी है, होली एक ऐसा पर्व जो हमें हर वर्ष यह स्मरण कराता है कि विविधता में ही सच्ची एकता का रंग छिपा है। होली के संदर्भ में प्रसिद्ध कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र की यह कविता आज भी प्रासंगिक है-
“गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में,
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में”

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