भारतीय बैडमिंटन की पूर्व स्टार खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने एक बार फिर भारतीय खेल व्यवस्था पर खुलकर हमला बोला है। अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जाने वाली ज्वाला ने कहा कि भारतीय बैडमिंटन में चुप्पी और समझौते की संस्कृति बढ़ती जा रही है, जो खेल के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है।

भारत की दिग्गज ज्वाला गुट्टा ने खोली भारतीय बैडमिंटन की पोल
बोलीं- सब समझौता कर रहे हैं, लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं
जूनियर खिलाड़ियों को मदद मिली, मैं तो खुद ही खर्च उठाती रही
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
भारतीय बैडमिंटन की पूर्व स्टार खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने एक बार फिर भारतीय खेल व्यवस्था पर खुलकर हमला बोला है। अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जाने वाली ज्वाला ने कहा कि भारतीय बैडमिंटन में चुप्पी और समझौते की संस्कृति बढ़ती जा रही है, जो खेल के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। एक साक्षात्कार के दौरान ज्वाला ने खिलाड़ियों, पूर्व खिलाड़ियों और बैडमिंटन संघों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिस्टम की कमियों के बावजूद कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता। उन्होंने कहा- कोई कुछ नहीं बोल रहा। हर कोई एडजस्ट कर रहा है, समझौता कर रहा है। यहां तक कि एसोसिएशन भी। सबसे खराब बात यह है कि जो पूर्व खिलाड़ी अब संघ में जा रहे हैं, उन्हें भी यह बुरा नहीं लगता कि हमारे पास बेंच स्ट्रेंथ ही नहीं है।
भारत में नई प्रतिभाएं सामने नहीं आ पा रही
ज्वाला ने भारतीय बैडमिंटन की तुलना चीन से करते हुए कहा कि वहां किसी खिलाड़ी के चोटिल होने पर तुरंत दूसरा विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार मिल जाता है, जबकि भारत में ऐसी स्थिति नहीं है। चीन को देखिए। अगर उनका एक वर्ल्ड चैंपियन चोटिल हो जाए तो दूसरा खिलाड़ी तैयार रहता है। वह एक-दो टूर्नामेंट खेलकर खुद वर्ल्ड चैंपियन बन जाता है। इसे बेंच स्ट्रेंथ कहते हैं और हमारे पास यही नहीं है। भारत में जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों को पर्याप्त अवसर और सही समर्थन नहीं मिल पाता, जिसकी वजह से नई प्रतिभाएं लगातार सामने नहीं आ पा रही हैं।
प्रभाव की कमी से सीएसआर फंड नहीं मिलता
ज्वाला ने अपनी अकादमी चलाने के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि हैदराबाद में गैर-लाभकारी अकादमी शुरू करने के बावजूद उन्हें आर्थिक मदद जुटाने में काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। मैंने भी एक अकादमी खोली है और मुझे पता है कि डोनेशन हासिल करने में कितनी परेशानी होती है। यह पूरी तरह गैर-लाभकारी संस्था है, लेकिन मुझे उरफ फंड नहीं मिल रहा, क्योंकि मैं उतनी प्रभावशाली नहीं हूं और मेरे रिश्ते दूसरों जैसे नहीं हैं। खेलों में कई बार प्रतिभा से ज्यादा पहचान और संपर्क मायने रखते हैं।
मेरी लड़ाई खेलने के अधिकार के लिए थी
ज्वाला ने कहा कि उनका बेबाक रवैया ही उनके खिलाफ चला गया। उन्होंने कहा- क्योंकि मैं खुलकर अपनी बात कहती हूं, इसलिए सिस्टम मुझे पसंद नहीं करता। जो लोग अभी खेलों को चला रहे हैं, चाहे बैडमिंटन हो या कोई और क्षेत्र, वे मुझे पसंद नहीं करते। ज्वाला ने कहा कि उनकी लड़ाई कभी निजी फायदे के लिए नहीं थी, बल्कि खेलने के अधिकार के लिए थी। मैंने कभी अपने लिए व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं मांगा। मैं हाई कोर्ट सिर्फ खेलने के अधिकार के लिए गई थी क्योंकि कोई मुझे खेलने से रोकना चाहता था।
अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट अपने पैसों से खेलती थी
ज्वाला ने दावा किया कि राष्ट्रीय चैंपियन और विश्व नंबर-5 होने के बावजूद उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट अपने खर्च पर खेलने पड़े। मैं 2007, 2008 और 2009 में राष्ट्रीय चैंपियन थी, लेकिन फिर भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट अपने पैसों से खेलती थी। मेरे जूनियर खिलाड़ियों को भारतीय टीम के साथ भेजा जाता था और वे क्वालीफाइंग राउंड में हार जाते थे, जबकि मैं टूर्नामेंट जीतती थी। यह अनुभव बेहद निराशाजनक था और इससे उन्हें सिस्टम की वास्तविकता समझ आई।
खिलाड़ियों की चुप्पी पर नाराजगी
ज्वाला गुट्टा ने कहा कि जब खिलाड़ी मुश्किल में होते हैं तो वे चाहते हैं कि कोई उनके लिए आवाज उठाए, लेकिन जब वह खुद संघर्ष कर रही थीं तब किसी खिलाड़ी ने उनका समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा- जब खिलाड़ी परेशानी में होते हैं तो चाहते हैं कि कोई उनके लिए बोले। लेकिन जब मैं मुश्किल में थी, तब एक भी खिलाड़ी ने मेरे लिए आवाज नहीं उठाई।
सिर्फ खेल तक सीमित मत रहिए
ज्वाला का मानना है कि कई खिलाड़ी खेल से बाहर अपनी अलग पहचान नहीं बना पाते क्योंकि वे सार्वजनिक तौर पर अपनी राय रखने से बचते हैं। उन्होंने कहा- जब आप बैडमिंटन छोड़ देंगे तो लोग आपके बारे में बात करना बंद कर देंगे, क्योंकि आपने कभी कुछ कहा ही नहीं। आपने बैडमिंटन के अलावा किसी मुद्दे पर अपनी राय नहीं रखी।


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