एम्स भोपाल में दो दिवसीय 'फॉरेंसिक अपडेट–VIII' कार्यशाला में देशभर के 70 से अधिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। यहां जले, दफन या सड़ चुके शवों में भी मृत्यु का सटीक समय जानने के लिए फॉरेंसिक एंटोमोलॉजी और जीनोमिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों पर प्रैक्टिकल प्रशिक्षण दिया गया।

एम्स भोपाल में दो दिवसीय 'फॉरेंसिक अपडेट–VIII' कार्यशाला आयोजित की गई।
भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 'फॉरेंसिक अपडेट–VIII' में देशभर के 70 से अधिक फॉरेंसिक विशेषज्ञ, फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और पीएचडी स्कॉलर एक मंच पर जुटे। 21 और 22 नवंबर को आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मृत्यु के बाद बीते समय (टाइम-सिंस-डेथ) का निर्धारण करने वाली आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों पर गहन चर्चा और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण देना था, ताकि आपराधिक मामलों में मौत के समय का पता और अधिक सटीकता से लगाया जा सके।
कार्यशाला में उन चुनौतीपूर्ण मामलों पर विशेष ध्यान दिया गया, जहां शव सड़ चुका हो, जला हो, पानी में मिला हो, विकृत हो चुका हो या दफन मिला हो। विशेषज्ञों ने बताया कि ऐसे मामलों में अब फॉरेंसिक एंटोमोलॉजी (कीट विज्ञान), पोस्ट-मॉर्टम रेडियोलॉजी, बायोकेमिकल और मेटाबोलिक मार्कर्स, जीनोमिक्स, प्रोटीओमिक्स और माइक्रोबायोलॉजी जैसी उन्नत वैज्ञानिक तकनीकें जांच को बेहद सटीक बना सकती हैं।
कार्यशाला का मुख्य आकर्षण प्रतिभागियों को दिया गया प्रैक्टिकल प्रशिक्षण रहा। इसमें डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग करते हुए सीखा कि बायोकेमिकल बदलावों को कैसे रिकॉर्ड किया जाता है, कीटों की उपस्थिति से मृत्यु का समय कैसे निर्धारित किया जाता है, रेडियोलॉजी और आणविक स्तर पर होने वाले परिवर्तन किस प्रकार मृत्यु का सही समय बताते हैं। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. माधवानंद कर के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. रजनीश जोशी, डीन (एकेडमिक्स), ने किया।

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