राम मंदिर दान चोरी मामले पर अखिलेश यादव ने बीजेपी में आंतरिक सत्ता संघर्ष का आरोप लगाया है। जानिए क्या है पूरा मामला और बीजेपी ने इस पर क्या पलटवार किया।

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर कड़ा प्रहार किया है। राम मंदिर के कथित दान चोरी मामले का जिक्र करते हुए अखिलेश ने आरोप लगाया कि इस मामले की जांच सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के बजाय एसआईटी (SIT) को सौंपने का निर्णय बीजेपी के भीतर चल रहे 'आंतरिक सत्ता संघर्ष' का परिणाम है। उन्होंने बिना नाम लिए इशारा किया कि बीजेपी में सत्ता के दो केंद्र काम कर रहे हैं—एक लखनऊ में और दूसरा दिल्ली में। उनके अनुसार, दिल्ली के नेतृत्व से पहले लखनऊ गुट ने जांच पर अपना नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए एसआईटी का गठन किया।
जनता के आक्रोश से डरी बीजेपी?
अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि मंदिर का चढ़ावा और दान एक 'चोरों के गिरोह' के हाथ लग गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि सत्ताधारी दल के नेता जनता के बढ़ते आक्रोश से डरे हुए हैं और इसी डर के कारण वे सामने आने से बच रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि "पैसे के लालच में लोगों ने अपना आपा खो दिया है।" अखिलेश ने भगवान राम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग राम के भक्त होने का दावा करते हैं, उन्होंने 'लक्ष्मण रेखा' और मर्यादा की सभी सीमाओं को लांघ दिया है।
बीजेपी का पलटवार: विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप
अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने सपा प्रमुख पर पलटवार करते हुए कहा कि विपक्षी दल राम मंदिर के मामले में केवल ओछी राजनीति कर रहे हैं। पाठक ने कहा, "समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का इतिहास राम मंदिर के विरोध का रहा है। ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी राम लला के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए थे और सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि यह स्थापित नहीं है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था।"
जांच प्रक्रिया पर सवाल और राजनीतिक बयानबाजी
खिलेश यादव ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग इस मामले की जांच करते, तो जांच की कमान दिल्ली के हाथ में होती। उन्होंने एसआईटी की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनता को यह समझना चाहिए कि जांच एजेंसी का चयन पार्टी के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों को दर्शाता है। जहाँ एक तरफ समाजवादी पार्टी इसे भ्रष्टाचार और आपसी कलह का मुद्दा बना रही है, वहीं बीजेपी इसे विपक्ष द्वारा आस्था के मामले का राजनीतिकरण करने का प्रयास बता रही है।
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