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भोपाल के हमीदिया अस्पताल में लापरवाही? मृत घोषित होने के 4 घंटे बाद नवजात की चली सांसें, परिजनों ने बनाया वीडियो

भोपाल के हमीदिया अस्पताल में एक नवजात को मृत बताकर डेथ सर्टिफिकेट देने के 4 घंटे बाद वह जीवित मिला। जानें क्या है 'Abortus' केस और वजन कम होने पर डॉक्टरों का क्या है तर्क।

By: Ajay Tiwari

Mar 19, 20266:03 PM

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भोपाल के हमीदिया अस्पताल में लापरवाही? मृत घोषित होने के 4 घंटे बाद नवजात की चली सांसें, परिजनों ने बनाया वीडियो

AI प्रतीकात्मक छवि

भोपाल। स्टार समाचार वेब

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित सरकारी हमीदिया अस्पताल से संवेदनहीनता और लापरवाही का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक नवजात शिशु को डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए जाने और परिजनों को मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) थमाए जाने के करीब चार घंटे बाद शिशु की सांसें चलने का दावा किया गया है। इस घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या है पूरा मामला?

रायसेन जिले के बरेली निवासी परवेज अपनी गर्भवती पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर रायसेन जिला अस्पताल ले गए थे, जहाँ से गंभीर स्थिति देखते हुए उन्हें हमीदिया अस्पताल रेफर किया गया। महिला की गर्भावस्था मात्र 5 से 6 माह की थी। प्रसव के दौरान महिला ने एक अत्यंत प्री-मैच्योर बच्ची को जन्म दिया, जिसका वजन मात्र 450 ग्राम था। डॉक्टरों के अनुसार, जन्म के समय शिशु में कोई हलचल या हार्टबीट (धड़कन) नहीं मिली, जिसके आधार पर उसे मृत मान लिया गया।

डेथ सर्टिफिकेट के बाद मिली 'जिंदगी'

परिजनों का आरोप है कि उन्हें रात करीब 12 बजे बच्ची का मृत्यु प्रमाण पत्र दे दिया गया, जिसमें मौत का समय रात 8:30 बजे दर्ज था। इसके बाद जब पिता परवेज कागजी कार्रवाई पूरी कर एनआईसीयू (NICU) में बच्ची का शव लेने पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बच्ची का पेट हिल रहा है और वह सांस ले रही है। पिता ने तुरंत इसका वीडियो बनाया, जो अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। परिजनों का कहना है कि जब उन्होंने इस पर सवाल किए, तो डॉक्टरों ने संतोषजनक जवाब देने के बजाय उनके साथ धक्का-मुक्की की और वीडियो बनाने से रोका।

डॉक्टरों का तर्क: 'Abortus' केस और मेडिकल प्रोटोकॉल

मामला गरमाने के बाद अस्पताल की स्त्री एवं प्रसूति विभाग की अध्यक्ष डॉ. शबाना सुल्तान और वरिष्ठ डॉक्टरों की टीम ने स्पष्टीकरण दिया। डॉक्टरों के अनुसार, यह एक 'Abortus' केस था। मेडिकल भाषा में जब भ्रूण 20 सप्ताह से पहले बाहर आ जाए या उसका वजन 500 ग्राम से कम हो, तो उसे जीवित रहने के योग्य नहीं माना जाता। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम वजन वाले शिशुओं में कभी-कभी 'प्राइमरी ऑब्जर्वेशन' में धड़कन नहीं मिलती, लेकिन शरीर में अवशिष्ट ऊर्जा के कारण कुछ समय बाद हल्की हलचल दिख सकती है। हालांकि, डॉक्टरों ने यह स्वीकार किया कि नवजात को पर्याप्त समय तक ऑब्जर्वेशन में रखा जाना चाहिए था और जल्दबाजी में दी गई जानकारी से भ्रम पैदा हुआ।

जांच और कार्रवाई का आश्वासन

अस्पताल प्रशासन ने ड्यूटी डॉक्टरों से इस पूरे घटनाक्रम पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। विभाग प्रमुख का कहना है कि महिला को देरी से रेफर किए जाने के कारण स्थिति पहले ही गंभीर थी, लेकिन यदि जांच में किसी भी स्तर पर स्टाफ की लापरवाही सिद्ध होती है, तो सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, अस्पताल में इस घटना को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है और प्रबंधन सुरक्षा मानकों का हवाला दे रहा है।

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