चित्रकूट जिले के थर पहाड़ गांव में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरीजों को पीठ पर लादकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। यह स्थिति विकास की हकीकत और सिस्टम की असलियत को उजागर करती है।

हाइलाइट्स
चित्रकूट, स्टार समाचार वेब
आज के वैज्ञानिक युग में दुनियाभर में ऐसे संसाधन उपलब्ध हैं जिसके सहारे लोग हजारों किलोमीटर कुछ घंटों में पहुंच जाते हैं। इतना ही नहीं आज इंसान चांद तक पहुंच चुका है, मगर प्रगति के इस दौर में आज भी कुछ ऐसे इलाके हैं जहां के वाशिंदों को चंद किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटो लग जाते हैं। यह यहां के लोगों की बद्किस्मती ही है कि वह विकास के दौर में भी कोसों दूर हैं। हालांकि इन हालातों से यहां के वाशिंदों ने समझोता कर रखा है, मगर कुछ खास मामलों में इन लोगों को हालातों से जूझना पड़ रहा है, जो दिल को झकझोर देता है। आलम यह है कि ऐसे इलाकों के लोगों को अतिआवश्यक सुविधा तक मुहैया नहीं हो पा रहीं, यही कारण है कि यहां के लोगों की जिंदगी कराह रही है।
न सड़क है, न वाहन
अविकसित इलाकों के हालात इतने बद्तर हैं कि यहां न तो सड़क है, और यहां न कोई वाहन आ सकता है। ऐसे में अतिआवश्यकता होने पर लोगों को शारीरिक व मानसिक दिक्कत से जूझना पड़ता है। ऐसा ही एक बद्किस्मत चित्रकूट नगर पंचायत क्षेत्र में आने वाला गांव है थड़ पहाड़। यहां संसाधनों के न होने से ग्रामीणों की जिंदगी कराह रही है। आलम यह है कि बीमार हुए बुजुर्गों को लोग पीठ पर लादकर पथरीले रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं। एक तो पथरीला रास्ता, ऊपर से पहाड़ पर चढ़ना, अपने आप में इस गांव की दुृर्दशा का बयान कर रहा है।
इलाज के लिए दादी को लादकर ले जाना पड़ा
थर पहाड़ गांव के महेंद्र सिंह की 60 वर्षीय दादी राजकली, पत्नी स्वर्गीय रमेश्वर सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई। स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने का कोई साधन न होने के कारण महेंद्र सिंह को उन्हें पीठ पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल तक पहुंचाना पड़ा। जिस रास्ते से महेंद्र सिंह गुजरे, वह पथरीला, ऊबड़-खाबड़ और पूरी तरह से अविकसित है। इन दुर्गम रास्तों से बीमार बुजुर्ग महिला को ले जाना किसी संघर्ष से कम नहीं था, लेकिन विकल्प न होने की मजबूरी ने महेंद्र को यह कदम उठाने को मजबूर कर दिया।
अतिआवश्यक सुविधाओं से हैं वंचित
स्थानीय लोगों का कहना है कि थर पहाड़ गांव के हालात वर्षों से ऐसे ही हैं। न सड़क है, न एम्बुलेंस की सुविधा, न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, न शुद्ध पानी और न ही कोई स्थायी सरकारी ध्यान। चुनावों के समय नेता आते हैं, वादे करते हैं, मगर चुनाव बीतते ही सब कुछ भूल जाते हैं। नेताओं के लिए हम सिर्फ़ वोट हैं, इंसान नहीं। बीमार को पीठ पर उठाकर लाना हमारी मजबूरी बन चुकी है।
सिस्टम की खुल रही पोल
ग्रामीण कहते हैं कि बीमार को पीठ पर लादकर पथरीले रास्ते से जाकर अस्पताल पहुंचाने का मामला शासन-प्रशासन के पूरे सिस्टम की की पोल खोल रहा है। यह तस्वीरें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की आंखें खोलने के लिए काफी होनी चाहिए, लेकिन अफसोस की बात है कि आज तक न किसी विधायक ने थर पहाड़ का दौरा किया और न ही किसी सांसद ने इन पहाड़ों की आवाज सुनी।
लोग कर रहे सवाल
थर्ड पहाड़ गांव के हालातों को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आज जब लोग चांद पर पहुंच रहे हैं, ऐसे में इस गांव के लोगों को क्या इंसान समझा जाएगा या फिर वह यूं ही नरकीय जीवन जीते रहेगें। सवाल हो रहा है कि क्या थर पहाड़ जैसी बस्तियों तक विकास की रौशनी कभी पहुंचेगी, या ये इलाके सदा यूं ही अंधेरे और उपेक्षा में सिसकते रहेंगे। मानवता को झकझोरती इस तस्वीर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे देश में विकास की कहानी अब भी अधूरी है।

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